मोबाइल और इंटरनेट कभी किताबों की जगह नहीं ले सकते: मंडलायुक्त

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मोबाइल और इंटरनेट कभी किताबों की जगह नहीं ले सकते: मंडलायुक्त


मोबाइल और इंटरनेट कभी किताबों की जगह नहीं ले सकते: मंडलायुक्त


मोबाइल और इंटरनेट कभी किताबों की जगह नहीं ले सकते: मंडलायुक्त


--आर्टिफिशल इंटेलिजेन्स चित्र बना सकता है, चरित्र नहीं : कुलपति

--अनुभव के लिए जीवन छोटा है, इसलिए पुस्तकों से लीजिए ज्ञान: प्रो.मुकेश पांडेय

--सात दिवसीय पुस्तक मेला का हुआ भव्य शुभारम्भ, युवाओं में दिखा उत्साह

झांसी, 24 मार्च (हि.स.)। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोधपीठ, प्रज्ञा लिटरेरी क्लब, सृजन क्लब तथा हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय पुस्तक मेला एवं संगोष्ठी का सोमवार को भव्य शुभारम्भ हुआ। अतिथियोंने तमाम स्टालों का अवलोकन कर मेला स्थल पर बने बुंदेली दीर्घा को भी देखा।

मुख्य अतिथि बिमल कुमार दुबे ने कहा, प्राचीन समय में शिक्षा, श्रुति व्यवस्था के अंतर्गत होती थी। गुरु बोलते थे और शिष्य उसे सुनकर ग्रहण करते थे। उसके बाद हस्तलिपियां और फिर पुस्तकों की प्रिंटिंग शुरू हुई। बोलकर फैलाये जाने वाले ज्ञान का लिखकर संग्रहण किया गया। परंतु, आज के समय में मोबाइल और इंटरनेट के कारण पुस्तक पढ़ने में कोई रुचि नहीं लेता है। ज्ञान का माध्यम पुस्तकों का अध्ययन है। शिक्षक से मिलने वाले ज्ञान के अलावा स्वाध्याय भी महत्वपूर्ण है।

विशिष्ट अतिथि नालंदा विश्वविद्यालय, बिहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने युवाओं को सम्बोधित करते हुए कहा, मैं पहली बार बुंदेलखंड क्षेत्र में आया हूं और यहां आकर अच्छा लगा। आज के दौर में हमें यह जान लेने की आवश्यकता है कि पुस्तकों को पढ़ने के लिए अनुशासन बहुत जरूरी है। यदि आप स्वयं को अनुशासित रख कर नहीं पढ़ते हैं तो आप कुछ भी सीख नहीं पाएंगे। मैं नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़ा हूं और नालंदा विश्वविद्यालय ही वह जगह है जहां 90 लाख किताबें वर्षों तक जलती रहीं थीं। जापान, चीन, मंगोलिया, कोरिया जैसे देशों की जो बौद्ध संस्कृति है उन सब की रूपरेखा हमारी पुस्तकों के ट्रांसलेशन पर ही आधारित है। पुस्तकों के बीच में होने से चरित्र का जो निर्माण होता है। वह आभासी ज्ञान कभी नहीं कर सकता। आर्टिफिशल इंटेलिजेन्स चित्र बना सकता है, चरित्र नहीं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.मुकेश पांडेय ने कहा कि हम अपने बचपन में चित्रों वाली किताब पढ़ते थे। उन किताबों में जो चित्र होते थे उसी के अनुसार हम चरित्र को अपने मन में गढ़ते थे। ज्ञान या तो अनुभव से आता है या फिर पुस्तकों से। अनुभव लेने के लिए जीवन बहुत छोटा है परंतु आप पुस्तकों से भरपूर ज्ञान ले सकते हैं।

प्रो.मुकेश पांडेय ने नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सिद्धार्थ सिंह से एक एम ओ यू साइन करने का निवेदन भी किया। जिससे दोनों विश्वविद्यालयो के छात्र-छात्राओं को और अधिक सुविधाएं प्रदान की जा सकें। अतिथियों का स्वागत हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. मुन्ना तिवारी तथा आभार कुलसचिव विनय कुमार सिंह ने ज्ञापित किया। संचालन डॉ.अचला पांडेय ने किया।

सांस्कृतिक संध्या में द्रौपदी चीरहरण पर आधारित नाटक, कथक प्रस्तुति तथा नीरज एंड पार्टी ने सबका दिल जीत लिया। इस अवसर पर डॉ. श्रीहरि त्रिपाठी, डॉ. बिपिन प्रसाद, नवीन चंद्र पटेल, डॉ. प्रेमलता श्रीवास्तव, डॉ. सुधा दीक्षित, डॉ. शैलेंद्र तिवारी, डॉ. द्यूती मालिनी, डॉ. आशीष दीक्षित, डॉ. सत्येंद्र चौधरी, डॉ. सुनीता वर्मा, डॉ. आशुतोष शर्मा, डॉ. राघवेंद्र, कपिल शर्मा, डॉ. रामनरेश, डॉ. जोगेंद्र, डॉ. पुनीत, गरिमा, रिचा सेंगर, आकांक्षा सिंह, मनीष मंडल, विशाल, अजय तिवारी समेत कई अन्य शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी आदि मौजूद रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / महेश पटैरिया

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