मप्र जनजातीय संग्रहालय में बुन्देलखण्ड अंचल के विवाह और त्यौहारों के बधाई नृत्य की हुई प्रस्‍तुति

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मप्र जनजातीय संग्रहालय में बुन्देलखण्ड अंचल के विवाह और त्यौहारों के बधाई नृत्य की हुई प्रस्‍तुति


मप्र जनजातीय संग्रहालय में बुन्देलखण्ड अंचल के विवाह और त्यौहारों के बधाई नृत्य की हुई प्रस्‍तुति


मप्र जनजातीय संग्रहालय में बुन्देलखण्ड अंचल के विवाह और त्यौहारों के बधाई नृत्य की हुई प्रस्‍तुति


भोपाल, 30 मार्च (हि.स.)। मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य, गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि संभावना का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें रविवार को बधाई नृत्य राजेश चौरसिया एवं साथी- सागर, अखाड़ा देवेन्द्र डेहेरिया एवं साथी सिवनी, कबीर गायन नमन तिवारी एवं साथी- नर्मदापुरम द्वारा प्रस्तुति दी गई।

गतिविधि में राजेश चौरसिया एवं साथी, सागर द्वारा बधाई नृत्य प्रस्तुत किया गया। बुन्देलखण्ड अंचल में जन्म विवाह और तीज-त्यौहारों पर बधाई नृत्य किया जाता है। मनौती पूरी हो जाने पर देवी-देवताओं के द्वार पर बधाई नृत्य होता है। इस नृत्य में स्त्रियाँ और पुरुष दोनों ही उमंग से भरकर नृत्य करते हैं। बूढ़ी स्त्रियां कुटुम्ब में नाती-पोतों के जन्म पर अपने वंश की वृद्घि के हर्ष से भरकर घर के आंगन में बधाई नाचने लगते हैं। नेग-न्यौछावर बांटती हैं। मंच पर जब बधाई नृत्य समूह के रूप में प्रस्तुत होता है, तो इसमें गीत भी गाये जाते हैं। बधाई के नर्तक, चेहरे के उल्लास, पद संचालन, देह की लचक और रंगारंग वेशभूषा से दर्शकों का मन मोह लेते हैं। इस नृत्य में ढपला, टिमकी, रमतूला और बांसुरी आदि वाद्य प्रयुक्त होते हैं।

इसके बाद देवेंद्र डहरिया एवं साथी,सिवनी द्वारा अखाड़ा की प्रस्तुति दी गई। प्रदेश के बुंदेलखंड एवं अन्य अंचलों में अखाड़ा कला पूर्व कई काल से चला आ रहा है। युद्ध के दौरान अस्त्रों-शास्त्रों का प्रयोग किया जाता था और उनसे बचने की कला भी सिखाई जाती थी। अखाड़ा शौर्य का प्रतीक है। आज भी मैहर में आल्हा और उदल का अखाड़ा है। बुंदेलखंड में अखाड़ा लोक नृत्य नवरात्रि के अवसर पर किया जाता है। इस कला में तलवार, ढाल, लाठी, भाला आदि शस्त्रों का प्रयोग किया जाता है। ढोल की थाप पर कलाकार नृत्य और शौर्य कला को दिखाते हैं।

कार्यक्रम में नमन तिवारी एवं साथी, नर्मदापुरम द्वारा कबीर गायन की प्रस्तुति दी गई। उन्होंने ठगिनी क्या नैया चमकावे...,मन लागो मेरो यार फकिरी में...,तेरा-मेरा मनवा कैसे एक होये रे..., मानत नाही मन मोरा साधो..., माया कहा ठगिनी मह जाने...,बीत गए दिन भजन बिना रे..., गीतों की प्रस्तुति दी।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में प्रति रविवार दोपहर 02 बजे से आयोजित होने वाली गतिविधि में मध्य प्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति होती है। जिसमें जनसामान्‍य को देश के अन्य राज्यों के कला रूपों को देखने समझने का अवसर प्राप्त होता है।

हिन्दुस्थान समाचार / उम्मेद सिंह रावत

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