वाराणसी के अधिवक्ता ने बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण पर उठाया सवाल, बताया प्रकृति के लिए गंभीर समस्या  

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वाराणसी। भारत में स्वच्छ भारत अभियान के तहत स्वच्छता की बात की जा रही है। वहीँ बायो-मेडिकल वेस्ट एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रहा है।कोरोना काल के शुरुआती दौर में लॉकडाउन के दौरान प्रकृति ने जहां स्वयं को रिकवर किया। कुछ ही दिनों बाद एक नई समस्या एकल उपयोग वाले प्लास्टिक एवं अन्य सामग्रियों के रूप में सामने आई है। चाहे वह पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट यानी पीपीई कीट के रूप में हो या मास्क या फिर दस्ताने या फिर फेस शील्ड के रूप में हो। कोरोना के कारण आजकल बड़ी मात्रा में बायो-मेडिकल वेस्ट पैदा हो रहा है।

एकल प्रयोग वाले सामान को कोरोना के प्रति सुरक्षा से जोडऩे वाली बात ने इसे और भी खतरनाक बना दिया है। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अधिवक्ता एवं ह्यूमन राइट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपसचिव प्रशान्त त्रिपाठी ने सवाल उठाते हुए एक पत्र लिखा है और इसे प्रकृति के लिए गंभीर समस्या बताया है। 

प्रशान्त त्रिपाठी के अनुसार परिवार में क्वारंटीन व्यक्ति हो या प्लास्टिक प्लेट्स या पैकिंग। इसने यूज एंड थ्रो कल्चर को बढ़ावा दिया है, जिसमें बदलाव की जरूरत है। हम जितनी अधिक सफाई का ध्यान रखेंगे, उतना ही कोरोना से सुरक्षित होंगे न कि एकल प्रयोग वाली सामग्रियों के अत्यधिक उपयोग से। भारत में तेजी से निजी, सरकारी अस्पताल, नर्सिंग होम एवं पैथोलॉजी लैब बढ़े हैं। उतनी ही तेजी से बायो-मेडिकल वेस्ट बढ़ रहा है। सामान्य कचरे में इस तरह का वेस्ट डाला जा रहा है, जो संक्रमण फैला रहा है।बायो मेडिकल वेस्ट निपटान में जो संस्थान निर्देशों का पालन नहीं करें, उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
 
प्रशांत ने कहा कि कोविड -19 महामारी की दूसरी लहर ने भारत के समक्ष कई चुनौतियों को प्रस्तुत किया है,जबकि देश में पहले से ही स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को लेकर कई मोर्चों पर चुनौतियाँ विद्यमान हैं। ऐसा ही प्रभाव कोविड के प्रकोप ने पर्यावरण पर डाला है,वह है जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (Biomedical Waste) की मात्रा में तेज़ी से वृद्धि होना। 

एक चुनौती के रूप में कोविड 
जैव-चिकित्सा अपशिष्ट से विभिन्न स्वास्थ्य और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं तथा यह एक व्यापक चुनौती है जो इस महामारी के समय हमारे समक्ष उत्पन्न हुई है। यद्यपि चिकित्सा अपशिष्ट को अत्यधिक सावधानी से संभालने और सुरक्षित रूप से निपटान करने हेतु दिशा-निर्देश हैं, महामारी के कारण जैव-चिकित्सा अपशिष्ट की मात्रा में तेज़ी से हुई वृद्धि ने इस कार्य को अत्यधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार,मई 2021 के दौरान कोविड-19 से संबंधित जैव-चिकित्सा अपशिष्ट उत्पादन की औसत मात्रा लगभग 203 टन प्रतिदिन है। जैव-चिकित्सा अपशिष्ट का अधिकतम उत्पादन लगभग 250 टन प्रतिदिन था। वर्ष 2020 में पहली बार जैव-चिकित्सा अपशिष्ट का अधिकतम उत्पादन 180- 220 टन प्रतिदिन था। इस 250 टन अपशिष्ट में केवल कोविड से संबंधित कचरा शामिल है। भारत द्वारा प्रतिदिन उत्पन्न किये जाने वाले अधिकतम अपशिष्ट की कुल मात्रा 1000 टन है जिसमें सिर्फ 25 फीसदी कोविड से उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट की मात्रा शामिल है। 

उन्होंने कहा कि जैव-चिकित्सा अपशिष्ट को मानव और पशुओं के उपचार के दौरान उत्पन्न शारीरिक अपशिष्ट जैसे- सुई, सिरिंज तथा स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में उपयोग की जाने वाली अन्य सामग्रियों के रूप में परिभाषित किया जाता है। कोविड-19 से संबंधित जैव-चिकित्सा अपशिष्ट: व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (Personal Protective Equipment- PPE), दस्ताने, फेस मास्क, हेड कवर, प्लास्टिक कवर ऑल, सीरिंज, सेनेटाइजर के उपयोग किए प्लास्टिक के बॉटल और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं तथा रोगियों दोनों द्वारा उपयोग किये जाने वाले चिकित्सा उपकरण इत्यादि जैव-चिकित्सा अपशिष्ट जैविक और रासायनिक दोनों ही प्रकार से खतरनाक अपशिष्ट होता है, जो जैविक एवं सूक्ष्मजीवों से संदूषित या दूषित होता है। इसमें विभिन्न प्रकार के रोगों को फैलाने की क्षमता होती है।


इसके अलावा कोविड से संबंधित जैव-चिकित्सा अपशिष्ट में विभिन्न प्रकार की दवाएंँ भी शामिल हैं जो ज़हरीली प्रकृति की होती हैं।जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन हेतु प्रावधान: पर्यावरण,वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा 'जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (Biomedical Waste Management Rules, 2016) को अधिसूचित किया गया है।इसके साथ ही जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के प्रबंधन हेतु कॉमन बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (Biomedical Waste Treatment Facility- CBWTF) नामक एक अन्य सुविधा भी है।यह एक ऐसा सेट-अप है जिसमें सदस्यों की स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं से उत्पन्न जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करने हेतु आवश्यक उपचार प्रदान किया जाता है।

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