भारतीय ज्ञान परम्परा और शोध प्रवृत्तियों से ही होगा बौद्धिक आत्मनिर्भरता का उदय : अभय प्रताप सिंह

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भारतीय ज्ञान परम्परा और शोध प्रवृत्तियों से ही होगा बौद्धिक आत्मनिर्भरता का उदय : अभय प्रताप सिंह


--शोध समिति, इविवि और केंद्रीय संस्कृत विवि के संयुक्त तत्वावधान में संगोष्ठी का आयोजन

प्रयागराज, 07 अप्रैल (हि.स.)। शोध समिति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के गंगानाथ झा परिसर, प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परम्परा : शोध पद्धतियां और दृष्टिकोण“ विषयक एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इसके माध्यम से शोधार्थियों को भारतीय दृष्टि से अनुसंधान के विविध आयामों से अवगत कराया गया।

मुख्य अतिथि अभाविप के राष्ट्रीय मंत्री अभय प्रताप सिंह ने शोधार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि, “भारत की शोध दृष्टि हमेशा से लोक कल्याणकारी रही है। हमें औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर अपनी मौलिक शोध पद्धतियों को अपनाना होगा। भारतीय ज्ञान परम्परा में सत्य की खोज केवल भौतिक नहीं, बल्कि समग्रता में की गई है। जब शोधार्थी अपनी जड़ों से जुड़कर अनुसंधान करेंगे, तभी भारत पुनः विश्व गुरु के पद पर आसीन होगा।“

मुख्य वक्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. चंद्रंशु सिन्हा ने कहा कि, “शोध आयाम का उद्देश्य विद्यार्थियों में भारतीय दृष्टिकोण से शोध करने की प्रवृत्ति विकसित करना है। हमारे शास्त्रों में तर्क और प्रमाण की जो सुदृढ़ व्यवस्था है, वह आधुनिक विज्ञान के लिए भी अनुकरणीय है।“ वहीं शोध के राष्ट्रीय सह-संयोजक हिमांशु पांडेय ने मनोविज्ञान और व्यवहारिक शोध में भारतीय मूल्यों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला और अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. ललित कुमार त्रिपाठी ने करते हुए कहा कि, “भारतीय ज्ञान प्रणाली शोध के असीमित अवसरों से भरी हुई है। गंगानाथ झा परिसर जैसे संस्थान शोधार्थियों के लिए प्राचीन और आधुनिक पद्धतियों के सेतु के रूप में कार्य कर रहे हैं।“ इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शोधार्थी एवं अभाविप सदस्य व केंद्रीय मीडिया टोली अभिनव मिश्र सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र

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