प्रकृति और संस्कृति के संतुलन से ही सतत विकास संभव : डॉ. राजेंद्र सिंह

WhatsApp Channel Join Now
प्रकृति और संस्कृति के संतुलन से ही सतत विकास संभव : डॉ. राजेंद्र सिंह


कानपुर, 12 सितंबर (हि.स.)। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान के पुनर्जीवन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही सतत विकास का मजबूत आधार तैयार किया जा सकता है। प्रकृति और संस्कृति के बीच संतुलन बनाकर भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित करना होगा। यह बातें शनिवार को जल संरक्षण विशेषज्ञ एवं तरुण भारत संघ के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र सिंह ने नई दिल्ली में आयोजित भू-सांस्कृतिक कार्यशाला ‘प्रकृति–संस्कृति विचार मंथन’ के दौरान कहीं।

हरिजन सेवक संघ, गांधी आश्रम, किंग्सवे कैंप में 11 से 13 सितंबर तक आयोजित कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों और दिल्ली से आए 100 से अधिक विद्वान, कृषक, पर्यावरणविद और विशेषज्ञ शामिल हुए। इसमें प्रकृति, संस्कृति, कृषि, जल संसाधनों और स्थानीय अर्थव्यवस्था के आपसी संबंधों पर मंथन किया गया।

कार्यशाला में भू-सांस्कृतिक मानचित्र के सात प्रमुख घटकों पर चर्चा हुई। इनमें भूमि और मृदा संरक्षण, नदियों व जलस्रोतों का संरक्षण, वर्षाजल संचयन, कृषि परंपराओं व स्थानीय ज्ञान का संरक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन और स्थानीय संस्कृति शामिल रहे। इस अवसर पर डॉ. राजेंद्र सिंह और प्रो. भरत राज सिंह की पुस्तक ‘अरावली-भारत की जीवन रेखा : न्यायिक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरणीय संरक्षण’ का विमोचन किया गया।

कार्यशाला में पूर्व कुलपति डॉ. कन्हैया लाल श्रीवास्तव, प्रो. राणा प्रताप सिंह, प्रो. भरत राज सिंह, डॉ. इंद्राणी खुराना समेत विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, कृषकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सहभागिता की। वक्ताओं ने जल एवं भूमि प्रबंधन, टिकाऊ कृषि और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को सतत विकास के लिए जरूरी बताया।

कार्यशाला का समापन 13 सितंबर को होगा। इसमें तीन दिवसीय विचार मंथन से सामने आए प्रमुख निष्कर्ष और निर्णय प्रस्तुत किए जाएंगे।

----------------

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

Share this story