जल संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता : डॉ. ए.के. गुप्ता

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जल संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता : डॉ. ए.के. गुप्ता


लखनऊ, 16 जुलाई (हि.स.)। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में गुरूवार को मानव विकास एवं परिवार अध्ययन विभाग बीबीएयू एवं राज्य संग्रहालय, लखनऊ, संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में भू-जल सप्ताह के अवसर पर'आने वाली पीढ़ियों हेतु सुरक्षित जल: एक सामूहिक जिम्मेदारी' विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की।

मुख्य अतिथि एवं वक्ता तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के अपर निदेशक डॉ. ए.के. गुप्ता ने कहा कि विश्व में पेयजल के उपलब्ध स्रोत लगातार घटते जा रहे हैं, जिससे जल संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। इसीलिए वैज्ञानिक तकनीकों के साथ-साथ पारंपरिक एवं स्थानीय जल संरक्षण विधियों को अपनाकर वर्षा जल संचयन और भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा देना होगा। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा संचालित नमामि गंगे तथा अन्य जल संरक्षण योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन पहलों के माध्यम से नदियों के संरक्षण, स्वच्छता एवं पुनर्जीवन की दिशा में प्रभावी कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में शुगर मिलों, थर्मल पावर प्लांटों तथा अन्य औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट के कारण जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं, इसीलिए रेगुलेटरी अथॉरिटीज़ को इस दिशा में और अधिक प्रभावी एवं सख्त निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हम जितना जल प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त करते हैं, उतना ही जल बचाने एवं उसके पुनर्भरण का प्रयास करना हमारा नैतिक दायित्व है। साथ ही उन्होंने मिशन लाइफ अभियान पर प्रकाश डालते हुए पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने और जल संरक्षण को दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का आह्वान किया।

विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने कहा कि वर्तमान समय में जल संकट केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के सामने एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रहा है। बढ़ती जनसंख्या, अनियंत्रित भू-जल दोहन तथा जल स्रोतों के प्रदूषण के कारण जल संरक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में हम सभी का नैतिक दायित्व है कि जल का विवेकपूर्ण सदुपयोग करें तथा वर्षा जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण और जल संरक्षण से जुड़े प्रयासों को जन-आंदोलन का स्वरूप दें। प्रो. मित्तल ने हरित क्रांति को नई गति प्रदान करने तथा नदियों के पुनर्जीवन (रिवर रीजुवेनेशन) की दिशा में सामूहिक रूप से कार्य करने पर बल देते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित किए बिना देश में दीर्घकालिक खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करना संभव नहीं है।

राज्य संग्रहालय, लखनऊ के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह ने बताया कि भारत के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं परंपराओं में जल संरक्षण और जल संचयन को सदैव अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसे जनभागीदारी और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही प्रभावी बनाया जा सकता है। उन्होंने प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के धोलावीरा नगर का उदाहरण देते हुए बताया कि गुजरात के कच्छ जिले में स्थित यह ऐतिहासिक नगर अपनी उन्नत वर्षा जल संचयन प्रणाली एवं उत्कृष्ट जल प्रबंधन के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, जो आज भी सतत जल संरक्षण का प्रेरणादायी मॉडल प्रस्तुत करता है।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. जितेन्‍द्र पाण्डेय

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