परशुराम जयंती धर्म, शौर्य और नैतिक नेतृत्व का अद्भुत संगम: प्रो. बिहारी लाल शर्मा

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परशुराम जयंती धर्म, शौर्य और नैतिक नेतृत्व का अद्भुत संगम: प्रो. बिहारी लाल शर्मा


वाराणसी,19 अप्रैल (हि.स.)। वैशाख शुक्ल तृतीया रविवार को भगवान परशुराम की जयंती श्रद्धा, आस्था और सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि भगवान परशुराम का जीवन केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि समकालीन समाज के लिए एक सशक्त नैतिक-दर्शन प्रस्तुत करता है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था।

कुलपति प्रो.शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि भगवान परशुराम, जिन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, ज्ञान और शक्ति के अद्वितीय समन्वय के प्रतीक हैं। महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र परशुराम ने तप, त्याग, संयम और शौर्य के माध्यम से धर्म की पुनःस्थापना का कार्य किया। कार्तवीर्य अर्जुन जैसे अत्याचारी शासकों के विरुद्ध उनका संघर्ष इस तथ्य को रेखांकित करता है कि शक्ति का प्रयोग सदैव न्याय और लोककल्याण के लिए होना चाहिए।

प्रो. शर्मा ने कहा कि समसामयिक सन्दर्भों में हम देखते हैं कि वर्तमान युग में, जब समाज विभिन्न प्रकार की विषमताओं, नैतिक चुनौतियों और मूल्यों के संकट से जूझ रहा है, तब भगवान परशुराम का आदर्श मार्गदर्शक बनकर सामने आता है। भगवान परशुराम का जीवन हमें यह सिखाता है कि शासन-व्यवस्था और नेतृत्व का आधार नैतिकता, पारदर्शिता और जनकल्याण होना चाहिए।

आज की शिक्षा-व्यवस्था में केवल ज्ञानार्जन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि चरित्र-निर्माण और आत्मानुशासन का समावेश भी अनिवार्य है। भगवान परशुराम ‘ब्राह्मतेज’ और ‘क्षात्रतेज’ के समन्वय के प्रतीक हैं, जो यह सन्देश देते हैं कि समाज में संतुलित विकास के लिए बौद्धिक क्षमता और साहस, दोनों का होना आवश्यक है।

कुलपति ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे परशुराम के जीवन से प्रेरणा लेकर अन्याय और अधर्म के विरुद्ध सजग रहें तथा अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनें। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में आत्मसंयम, अनुशासन और नैतिकता का महत्व और भी बढ़ गया है, जिसे अपनाकर ही एक सशक्त और संस्कारित समाज का निर्माण किया जा सकता है। पर्यावरण-संरक्षण के संदर्भ में भी भगवान परशुराम के जीवन को प्रासंगिक बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रकृति के साथ सन्तुलित सह-अस्तित्व आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। परशुराम के जीवन में निहित यह सन्देश वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान के लिए प्रेरणादायक है। वस्तुतः भगवान परशुराम की जयंती हमें यह संकल्प लेने का अवसर प्रदान करती है कि हम अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में धर्म, न्याय और करुणा के सिद्धान्तों का पालन करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और इसी मार्ग पर चलकर हम एक समरस, सशक्त और नैतिक समाज की स्थापना कर सकते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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