पूर्वजों के श्राद्ध करने से श्राद्धकर्ताओं में नकारात्मक ऊर्जा में पचास फीसदी कमी,सकारात्मक ऊर्जा दोगुनी
—श्राद्ध कर्ताओं ने 'ऑरा एंड एनर्जी स्कैनर' का उपयोग कर पुरोहितों और विधि के घटकों के सूक्ष्म ऊर्जा, औरा के आंकड़े दर्ज किए
वाराणसी,02 अक्टूबर (हि.स.)। सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके लिए श्राद्ध विधि करने की परंपरा से जोड़ा जाता है। क्या श्राद्ध विधि का प्रभाव इसे करने वाले व्यक्ति और उससे जुड़े अन्य लोगों के सूक्ष्म ऊर्जा स्तर पर भी देखा जा सकता है? गोवा स्थित महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय से जुड़े एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ऐसा दावा किया है।
अध्ययन के अनुसार, श्राद्ध विधि से पहले और बाद में श्राद्धकर्ताओं, पुरोहितों तथा विधि में प्रयुक्त विभिन्न सामग्रियों के 'ऑरा' और ऊर्जा स्तरों का अध्ययन किया गया। इसके लिए शोधकर्ताओं ने 'ऑरा एंड एनर्जी स्कैनर' का उपयोग किया।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, अध्ययन में चार श्राद्धकर्ताओं ने अपने परिवार के सदस्यों के साथ पितरों के लिए श्राद्ध विधि की, जबकि दो पुरोहितों ने पारंपरिक तरीके से विधि संपन्न कराई। विधि से पहले और बाद में संबंधित व्यक्तियों और विधि में प्रयुक्त घटकों के ऊर्जा संबंधी आंकड़े दर्ज किए गए।
अध्ययन में दावा किया गया कि चारों श्राद्धकर्ताओं के नकारात्मक ऊर्जा स्तर में लगभग 50 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई, जबकि सकारात्मक ऊर्जा में लगभग दोगुनी वृद्धि देखी गई। एक श्राद्धकर्ता की पत्नी के मामले में नकारात्मक ऊर्जा के ऑरा में करीब 60 प्रतिशत की कमी और सकारात्मक ऊर्जा में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज होने का दावा किया गया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, श्राद्ध विधि में शामिल दोनों पुरोहितों के सकारात्मक ऊर्जा स्तर में भी औसतन 55 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, भगवान दत्तात्रेय के चित्र के सकारात्मक ऊर्जा स्तर में विधि के बाद 47 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।
—पिंड, दर्भ और नैवेद्य में भी बदलाव का दावा
महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा की मधुरा धनंजय कर्वे के अनुसार, शोधकर्ताओं ने श्राद्ध विधि में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न सामग्रियों के ऊर्जा स्तर में भी बदलाव दर्ज किए। अध्ययन में दावा किया गया कि पितरों को अर्पित किए जाने वाले पिंड और दर्भ में विधि के बाद क्रमशः 25 मीटर और 19 मीटर से अधिक नकारात्मक ऊर्जा दर्ज की गई।
वहीं, देवताओं को अर्पित किए गए नैवेद्य की सकारात्मक ऊर्जा में श्राद्ध विधि के बाद 144 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होने का दावा किया गया। एक पूर्वज के चित्र के ऑरा में नकारात्मक ऊर्जा में 54 प्रतिशत की कमी और सकारात्मक ऊर्जा के निर्माण का भी उल्लेख अध्ययन में किया गया है। कर्वे ने कहा कि शोधकर्ताओं के अनुसार ये आंकड़े श्राद्ध विधि के आध्यात्मिक प्रभाव की ओर संकेत करते हैं। उनके मुताबिक, विधि भावपूर्वक किए जाने पर इससे मिलने वाला आध्यात्मिक लाभ अधिक हो सकता है। उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा में भगवान दत्तात्रेय को पितरों की सद्गति से जोड़ा जाता है और श्राद्ध स्थल पर उनका चित्र रखकर पूजा करने की परंपरा इसी मान्यता से संबंधित है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, मंत्रोच्चार के साथ पितरों को पिंड अर्पित करने की विधि का उद्देश्य उन्हें तृप्ति प्रदान करना और उनकी सद्गति में सहायता करना है। अध्ययन में यह भी दावा किया गया है कि इससे वंशजों को होने वाले कष्टों में कमी आ सकती है।
अध्ययन के निष्कर्षों में श्राद्ध करने वाले व्यक्ति, उसके परिवार, पुरोहित और पूर्वजों को आध्यात्मिक लाभ मिलने की बात कही गई है। शोधकर्ताओं ने पितृपक्ष के दौरान आध्यात्मिक साधना के रूप में प्रतिदिन एक से दो घंटे “ॐ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐ” नामजप करने की भी सलाह दी है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

