बाबा विश्वनाथ की नगरी में शक्ति आराधना के लिए तैयारी, आधी रात के बाद से शैलपुत्री के दरबार में शुरू होगा दर्शन पूजन
— शैलपुत्री का दरबार सजधज कर तैयार,अपर पुलिस आयुक्त ने तैयारियों को परखा
वाराणसी,10 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी में शारदीय नवरात्र को लेकर देवी मंदिरों में तैयारियों को अन्तिम रूप दिया गया। शनिवार देर रात से ही श्रद्धालु माता शैलपुत्री के अलईपुर स्थित दरबार में पहुंचने लगेंगे। शारदीय नवरात्र में पहले दिन देवी शैलपुत्री के दर्शन पूजन का विधान है। तैयारियों को परखने के लिए देर शाम अपर पुलिस आयुक्त शिवहरी मीणा अफसरों के साथ शैलपुत्री के दरबार में पहुंचे। उन्होंने मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था को परखा। अपर पुलिस आयुक्त ने निर्देश दिया कि मंदिर परिसर, प्रवेश-निकास द्वारों पर पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया जाए, अलग-अलग प्रवेश-निकास मार्ग, बैरिकेडिंग, सीसीटीवी, कंट्रोल रूम, पार्किंग व डायवर्जन की व्यवस्था की जाए। संदिग्ध व्यक्तियों, लावारिस वस्तुओं पर विशेष नजर रखने, महिला पुलिस की तैनाती और अफवाहों से बचने की अपील भी की गई। इस दौरान पुलिस उपायुक्त काशी जोन गौरव बंसवाल, एडीएम सिटी राजेश कुमार व थाना प्रभारी मौजूद रहे। बताते चले शारदीय नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री के दर्शन की मान्यता है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। पर्वतराज हिमालय शक्ति-दृढ़ता-आधार व स्थिरता का प्रतीक हैं। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। माना जाता है कि मां दुर्गा ने देवासुर संग्राम में प्रथम दिन शैलपुत्री का रूप धारण कर असुरों का संहार किया था। भगवती का वाहन वृषभ, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में प्रकट हुईं थीं। तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार वह अपने पिता के यज्ञ में गईं तो वहां अपने पति भगवान शंकर के अपमान को सह न सकीं। उन्होंने वहीं अपने शरीर को योगाग्नि में भस्म कर दिया। अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री नाम से पूजनीय व वंदनीय हुईं। इस जन्म में ही मां शैलपुत्री महादेव की ही अर्धांगिनी बनीं। आदि शक्ति शैलपुत्री अनन्त शक्तियों की स्वामिनी हैं।
पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर शनिवार की रात 9 बजकर 19 मिनट से शुरू हो गई है। इसका समापन 11 अक्टूबर की रात 9 बजकर 30 मिनट के आसपास होगा। उदया तिथि के आधार पर शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर से होगी। 11 अक्टूबर को घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। इस दौरान कलश स्थापना के लिए करीब 3 घंटे 52 मिनट का समय मिलेगा। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

