शारदीय नवरात्र में मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करने आते हैं काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ

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शारदीय नवरात्र में मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करने आते हैं काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ


शारदीय नवरात्र में मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करने आते हैं काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ


—51 शक्तिपीठों में शामिल है मीरघाट स्थित मां विशालाक्षी धाम, दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली में निर्मित है मंदिर

वाराणसी,12 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी) में शारदीय और चैत्र नवरात्र के दौरान आदिशक्ति की आराधना के लिए श्रद्धालुओं की आस्था उमड़ पड़ती है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में श्रद्धालु देवी के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन-पूजन के लिए मंदिरों में हाजिरी लगाते हैं। इसी क्रम में काशी के मीरघाट स्थित प्राचीन शक्तिपीठ मां विशालाक्षी मंदिर में भी देशभर से श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। मां सती के 51 शक्तिपीठों में शामिल इस धाम का काशी की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा में विशेष महत्व है।

पौराणिक मान्यताओं और काशी की लोक-परंपरा के अनुसार, काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ स्वयं प्रतिदिन रात्रि में मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करने आते हैं। इस मान्यता के चलते भी यह धाम श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। विशाल नेत्रों वाली मां विशालाक्षी को आदिशक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इनका महत्व कांची की मां कामाक्षी और मदुरै की मां मीनाक्षी के समान माना जाता है। देवी पुराण में भी इस शक्तिपीठ का उल्लेख मिलता है।

मंदिर के महंत परिवार के अनुसार, मां विशालाक्षी के दर्शन-पूजन से श्रद्धालुओं के कष्ट दूर होते हैं और सुख, समृद्धि व यश की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि देवी के दरबार में दान, जप और यज्ञ करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, मंगलवार के दिन 41 बार मां को कुमकुम अर्पित करने से देवी प्रसन्न होती हैं। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ रहती है।

महंत परिवार के वरिष्ठ सदस्य और पत्रकार राजनाथ तिवारी के अनुसार, मां विशालाक्षी धाम काशी के प्रमुख शक्तिपीठों में विशिष्ट स्थान रखता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए। काशी स्थित मां विशालाक्षी का मंदिर भी शक्ति उपासना के प्रमुख केंद्रों में शामिल है। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु मां के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।

——मुख्य प्रतिमा के सामने प्रतिष्ठित की गई दूसरी प्रतिमा

मंदिर में मां विशालाक्षी की दो प्रतिमाएं हैं। महंत परिवार के अनुसार, वर्ष 1971 में अभिषेक के दौरान पुजारी से हुई चूक के कारण मां की मुख्य प्रतिमा की एक अंगुली खंडित हो गई थी। इसके बाद मुख्य प्रतिमा के सामने मां की दूसरी प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई। वर्तमान में श्रद्धालु मंदिर में मां के दोनों स्वरूपों के दर्शन करते हैं।

——दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली में बना है मंदिर

मां विशालाक्षी मंदिर दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली का विशिष्ट उदाहरण है। महंत परिवार के अनुसार, वर्ष 1908 में मद्रास से जुड़े श्रद्धालुओं ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। गर्भगृह को छोड़कर मंदिर के अन्य हिस्सों में दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य की झलक दिखाई देती है। मंदिर के बाहरी भाग में रंग-बिरंगी आकृतियों में भगवान गणेश, भगवान शिव सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं। मां विशालाक्षी यहां की अधिष्ठात्री देवी हैं, जबकि काल भैरव को क्षेत्र का भैरव माना जाता है।

——भादों में मनाया जाता है मां का प्राकट्य उत्सव

मंदिर में भादों मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मां विशालाक्षी का प्राकट्य उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर मां का भव्य शृंगार किया जाता है और विराट आरती आयोजित होती है। उत्सव में स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ बड़ी संख्या में दक्षिण भारत से भी भक्त पहुंचते हैं। महंत परिवार की ओर से आयोजित भंडारे में हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं।

वहीं, वासंतिक चैत्र नवरात्र की पंचमी पर मां विशालाक्षी के नौ गौरी स्वरूप के दर्शन का भी विशेष धार्मिक महत्व है। शारदीय नवरात्र में भी मां के दरबार में श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और मंगलकामना की प्रार्थना करते हैं। मां विशालाक्षी धाम काशी की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, शक्ति उपासना और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। शारदीय और बांसतिक नवरात्र में काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ के दरबार से श्रृंगार सामग्री भी विशालाक्षी मंदिर में समर्पित की जाती है। माता के दरबार में श्रृंगार सामग्री अर्पित करने के पूर्व बाबा के पावन ज्योर्तिलिंग को इसे अवलोकन कराया जाता है।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

Livevns.news Desk
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