भारत से पुर्तगाल गया आयुर्वेद और संस्कृत वांग्मय का ज्ञान : प्रो. शिव कुमार सिंह

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भारत से पुर्तगाल गया आयुर्वेद और संस्कृत वांग्मय का ज्ञान : प्रो. शिव कुमार सिंह


बीएचयू में ‘पुर्तगाल में भारतीय ज्ञान परंपरा’ विषयक गोष्ठी

वाराणसी, 13 दिसंबर (हि.स.)। भारतीय अध्ययन केन्द्र, लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल के प्रो. शिव कुमार सिंह ने कहा कि भारत से बहुत सी चीजें पुर्तगाल में गई और वहाँ से यूरोप के अन्य देशों में गई। योग, आयुर्वेद और संस्कृत वांग्मय का ज्ञान भारत से पुर्तगाल गया था। पुर्तगाल का वैश्विक प्रभाव रहा है और इसी कारण से भारतीय ज्ञान भी अन्य देशों में गया। प्रो. शिव कुमार सिंह मंगलवार को ‘पुर्तगाल में भारतीय ज्ञान परंपरा’ विषयक गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के अन्तर सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र एवं मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि प्रो. सिंह ने पुर्तगाल के संस्कृति का जिक्र किया।

उन्होंने बताया कि पुर्तगाली महाकाव्य उश लूज़ियदश जो 1572 में लिखी गई, इसमें एक पूरा अध्याय भारत पर आधारित है। पुर्तगाल की सामुद्रिक शक्ति के कारण उसे समुद्रजनित साम्राज्य भी कहा जाता था। वास्कोडिगामा से पहले पेरो वाज डा कोविल्हा ने भारत के बारे में काफी जानकारियां इकट्ठी कर रखी थी। पुर्तगाल से भारत आए पादरी फ्रान्ससिको जेवियर ने यहाँ ईसाई धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रो. सिंह ने मार्टिन चेज की पुस्तक 'द फर्स्ट ग्लोबल विलेज' के उद्धरण से वैश्वीकरण के बारे में बताया।

उन्होंने बताया कि सर्वप्रथम 1240 में पंचतंत्र का लैटिन में अनुवाद के माध्यम से भारत से यूरोप का महत्त्वपूर्ण ज्ञानात्मक परिचय प्रारंभ हुआ। पादरी गास्पर दे अगुलार ने तमिल और अन्य कई भारतीय साहित्य का पुर्तगाली में अनुवाद किया। गार्सिया दे होर्ता पहले ऐसे पुर्तगाली यूरोपीय थे जिन्होंने भारतीय औषधियों, बीमारियों और औषधिशास्त्र पर गहन अध्ययन किया और उस महत्त्वपूर्ण ज्ञान को अपने लेखन से यूरोप तक पहुंचाया। भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार-प्रसार में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत के आयुर्वेदिक और औषधिक ज्ञान से संपृक्त होने के बाद ही यूरोप में मरीज का क्लीनिकल परीक्षण का प्रयास आरंभ हुआ। होर्ता के लेखन में चरक, सुश्रुत, हींग, नींबू, अदरक जैसे कई भारतीय शब्दों के बारे में उल्लेख मिलता है, जो भारतीय ज्ञान के प्रभाव को स्पष्ट रूप से दिखाता है। मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र के समन्वयक प्रो. संजय कुमार ने कहा कि पुर्तगाल सबसे पहले भारत में उपनिवेश बनाने वाला देश था। सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो. राजकुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया। गोष्ठी में प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. हरिकेश सिंह, प्रो. अर्चना कुमार, प्रो. आर. के. मिश्रा, डॉ. धर्मजंग, डॉ. प्रियंका सोनकर आदि की उपस्थिति रही।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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