सारनाथ को मिली वैश्विक पहचान, धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर गूंजा बुद्ध का संदेश

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—दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ, बौद्ध भिक्षुओं और विद्वानों ने की सहभागिता

—सारनाथ आने वाले समय में दुनिया के प्रमुख बौद्ध पर्यटन स्थलों में होगा शामिल : जयवीर सिंह

वाराणसी, 29 जुलाई (हि.स.)। आषाढ़ पूर्णिमा एवं धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर बुधवार को उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी स्थित ऐतिहासिक सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरूआत हुई। धम्मचक्क पवत्तन दिवस का महत्व विषयक संगोष्ठी में देश-विदेश से आए बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों और श्रद्धालुओं ने उल्लासपूर्ण माहौल में सहभागिता की।

संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने उपस्थित बौद्ध भिक्षुओं का स्वागत करते हुए कहा कि सरकार सारनाथ को वैश्विक बौद्ध पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म से जुड़े इस पवित्र स्थल की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के लिए विभिन्न स्तरों पर कार्य किए जा रहे हैं। प्रदेश सरकार का प्रयास है कि सारनाथ आने वाले देशी और विदेशी पर्यटकों को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, जिससे यहां पर्यटन गतिविधियों को नई गति मिल सके।

यूनेस्को की सूची में शामिल होने से बढ़ी सारनाथ की वैश्विक पहचान

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि सारनाथ अब भारत का 45वां और उत्तर प्रदेश का चौथा विश्व धरोहर स्थल बन गया है। लगभग 28 वर्षों बाद मिली इस महत्वपूर्ण मान्यता ने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और बौद्ध विरासत को नई पहचान दी है। अब तक प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध धरोहर स्थलों में ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी जैसे स्थल शामिल थे, जो आगरा क्षेत्र तक सीमित थे। सारनाथ के शामिल होने से उत्तर प्रदेश की विश्व धरोहर पहचान अब पूर्वांचल तक विस्तृत हो गई है, जो प्रदेश के लिए गर्व का विषय है।

बौद्ध विरासत को मिलेगी वैश्विक पहचान

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि सारनाथ की वैश्विक पहचान मजबूत होने से उत्तर प्रदेश के पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ख्याति मिलेगी। यह उपलब्धि न केवल प्रदेश की समृद्ध बौद्ध विरासत को विश्व स्तर पर स्थापित करेगी, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के नए अवसर भी सृजित करेगी। उन्होंने विश्वास जताया कि सारनाथ आने वाले समय में दुनिया भर के बौद्ध श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र बनेगा तथा भगवान बुद्ध के शांति और करुणा के संदेश को वैश्विक स्तर पर प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर जुटे देश-विदेश के बौद्ध विद्वान

अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ (संस्कृति विभाग) तथा महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, सारनाथ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, सारनाथ के अध्यक्ष वेन. आर. सुमित्थानंद थेरो सहित अनेक बौद्ध भिक्षु और विद्वान उपस्थित रहे। संगोष्ठी का उद्देश्य भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश और उनके धम्म संदेश को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाना है।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन के धम्मपद अनुवाद का हुआ लोकार्पण

संगोष्ठी में महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा मूल पाली से संस्कृत में अनूदित धम्मपद तथा प्रो. सिद्धार्थ सिंह द्वारा लिखित पुस्तक युगपुरुष कोसेत्सु नोसु को स्मरण करते हुए का लोकार्पण किया गया। संगोष्ठी की रूपरेखा प्रो. विमलेंद्र कुमार ने प्रस्तुत की। इस दौरान अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ के निदेशक डॉ. राकेश सिंह, संस्थान के सदस्य वेन. के. सिरी सुमेधा थेरो, महाबोधि विद्या परिषद, सारनाथ के अध्यक्ष एवं दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के पूर्व कुलपति प्रो. आर. एम. पाठक, एबीएसएस लखनऊ के सदस्य तरुणेश बौद्ध, कोलकाता विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग के प्रो. उज्ज्वल कुमार तथा नवनालंदा महाविहार, नालंदा के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने भी अपनी बात रखी।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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