पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता रद्द करे भारत सरकार : स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती

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पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता रद्द करे भारत सरकार : स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती


वाराणसी, 05 नवम्बर (हि.स.)। अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने गुरूवार को कहा कि हम संतों की मांग है कि नदी जल से संबंधित जो समझौते पाकिस्तान एवं पड़ोसी देशों से हुए हैं और समाप्त हो रहे हैं, उनका नवीनीकरण नहीं होना चाहिए। स्वामी जितेंद्रानंद सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा की ओर से आयोजित संस्कृति संसद के तीसरे दिन के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सिंधु नदी जल समझौता स्थगित के साथ पर सदा के लिए रद्द करके उसके जल का उपयोग भारत में होने चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि आज हम सजग नहीं रहे तो आगे जल संकट रहेगा। जल का संरक्षण आवश्यक है, क्योंकि भविष्य में तीसरा विश्वयुद्ध तेल नहीं, जल के लिए होगा। जल समझौते और राष्ट्रहित विषयक सत्र में अन्य वक्ताओं ने कहा कि गंगा इस देश की विरासत तथा धरोहर है। इसकी रक्षा आवश्यक है। सिंधु का पानी सतलज, रावी, व्यास, झेलम आदि नदियों को नहरों से जोड़कर दिल्ली में यमुना में मिलाकर देश में उपयोग सरकार को करना चाहिए। भारत सरकार को नदियों के संबंध में समाप्त हो रहे पड़ोसी देशों के साथ समझौतों की समीक्षा करनी चाहिए। कला-संस्कृति की आड़ में पश्चिम की संस्कृति भारत पर थोपना गलत है। भारत के सभी लोग एक ही पूर्वज के संतान हैं। वर्तमान समय में अर्बन नक्सल भारत को जलाने में लगा है।

शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण करना है

संस्कृति संसद के समापन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण करना है। चरित्र निर्माण के लिए संस्कृति का ज्ञान आवश्यक है और यह ज्ञान परिवार से आता है। इसके लिए संस्कार आवश्यक हैं। उन्होंने देश की माताओं से निवेदन किया कि छोटे बच्चों को उनके मनोरंजन के लिए मोबाइल पकड़ाकर भूल न करें। मोबाइल के कारण बच्चे का भविष्य प्रभावित हो रहा है। बच्चों को मोबाइल के स्थान पर संस्कार दें तथा उसको सनातन संस्कृति से जोड़ें।

समारोह में वरिष्ठ वैज्ञानिक (डी.आर.डी.ओ.) डॉ. अनंत नारायण भट्ट ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः व्यवस्थित और स्थापित करने की आवश्यकता है। गंगा की अविरल धारा में संस्कृति और विज्ञान दोनों सम्मिलित है।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

Livevns.news Desk
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