रंगभरी एकादशी: हरिश्चंद्रघाट पर धधकती चिताओं के बीच खेली गई चिता भस्म की होली

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—डीजे, ढोल, और डमरुओं की थाप के बीच 'खेले मसाने में होरी' गाने पर जमकर झूमे युवा

वाराणसी,इ27 फरवरी (हि.स.)। धर्म नगरी वाराणसी में रंगभरी एकादशी पर शुक्रवार अपरान्ह महाश्मशान हरिश्चंद्रघाट पर औघड संतों के साथ युवाओं ने पूरे उत्साह के साथ चिता भस्म से होली खेली। इस अनूठी मशाने की होली को देखने के लिए घाट पर दोपहर से ही लोगों की भीड़ जुटी रही। इस दौरान हर-हर महादेव के गगनभेदी उद्घोष से पूरा घाट गुंजायमान रहा।

हरिश्चंद्रघाट पर चिता भस्म की होली खेलने के पहले रविन्द्रपुरी स्थित भगवान कीनाराम स्थली 'क्रीं कुंड' से औघड़ सन्तों ने विशाल शोभायात्रा निकाली। काशी मोक्षदायिनी संस्था की ओर से निकाली गई शोभायात्रा में डमरूदल की गर्जना के बीच हर-हर महादेव का जयघोष करते नाचते गाते शिवगणों का रूप धारण किए भक्तों की टोली हरिश्चंद्र घाट पहुंची। शोभायात्रा में भगवान शिव व पार्वती के साथ नंदी, भृंगी, भूत, पिशाच, शृंगी, नाग, गंधर्व, देवता और किन्नरों की टोली भी घाट पर पहुंची। यहां महाश्मशान नाथ की पूजा और आरती के बाद घाट पर एक तरफ धधकती चिताएं और दूसरी ओर शिवभक्तों की अड़भंगी होली शुरू होते ही हर—हर महादेव का गगनभेदी उद्घोष होने लगा। ढोल और डमरुओं की थाप के बीच 'खेले मसाने में होरी' गाने पर युवा झूमते नाचते भूत-प्रेत-पिशाच का स्वांग रचाते चिता भस्म की होली खेलते रहे। घाट पर राग और विराग को एकाकार करने वाला नजारा दिखा। चंदन और चिता भस्म से रंगे शिव भक्त पहचान में ही नहीं आ रहे थे। काशी में मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन महादेव माता पार्वती का गौना कराकर काशी लौटे थे। उन्होंने काशीवासियों के साथ होली खेली थी। वे अपने गणों, भूत, प्रेत, पिशाच और अघोरियों के साथ होली नहीं खेल सके। तभी से वे अपने प्रिय श्मशान पर आकर गणों के साथ चिता-भस्म की होली खेलते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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