वाराणसी : शिव–गौरा के नगर भ्रमण में झलकेंगी उत्तर, दक्षिण और पश्चिम भारत की सांस्कृतिक छवियां

WhatsApp Channel Join Now
वाराणसी : शिव–गौरा के नगर भ्रमण में झलकेंगी उत्तर, दक्षिण और पश्चिम भारत की सांस्कृतिक छवियां


—अंगरखु, काठियावाड़ी कुर्ता और मुंडू में दिखेंगे बाबा विश्वनाथ, बंधानी–पटोला व कांजीवरम में दमकेंगी माता गौरा

वाराणसी, 20 फरवरी (हि.स.)। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी एक बार फिर इतिहास और परंपरा के अद्भुत संगम की साक्षी बनने जा रही है। रंगभरी एकादशी पर होने वाले शिव–गौरा के गौना महोत्सव में इस बार आस्था का उत्सव राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता का संदेश लेकर आएगा। दशकों पुरानी परंपराओं के बीच इस वर्ष पहली बार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल रजत प्रतिमा को गुजरात, राजस्थान और केरल के पारंपरिक वैभव में अलंकृत किया जाएगा। काशी की गलियों में जब शिव–गौरा का नगर भ्रमण होगा, तब उसमें उत्तर से दक्षिण और पश्चिम भारत की सांस्कृतिक छवियां एक साथ झलकेंगी।

—अहमदाबाद, जोधपुर और तिरुवनंतपुरम से आया राजसी श्रृंगार

टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। महंत वाचस्पति तिवारी ने शुक्रवार काे बताया कि इस वर्ष बाबा और गौरा के परिधान विशेष रूप से अहमदाबाद, जोधपुर और तिरुवनंतपुरम से मंगाए गए हैं। यह केवल परिधान परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय का सशक्त संदेश है। काशी की आध्यात्मिक परंपरा में देश के विविध प्रांतों की छटा समाहित होगी। महंत के अनुसार बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को गुजराती और केरल के पारंपरिक पुरुष परिधान में सजाया जाएगा। गुजराती शैली का अंगरखु,काठियावाड़ी कुर्ता और केरल की पारंपरिक वेष्टि/धोती (मुंडू) इन परिधानों में बाबा का स्वरूप अत्यंत राजसी और दिव्य दिखाई देगा। पारंपरिक कढ़ाई और सुनहरी जरी से सुसज्जित यह परिधान शिव–गौरा के गौना की गरिमा को और भव्य बनाएगा।

—दुल्हन के रूप में माता गौरा का अनुपम श्रृंगार

इस वर्ष माता गौरा को नववधू के रूप में विशेष रूप से अलंकृत किया जाएगा। गुजराती बंधानी/पटोला,दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कांजीवरम साड़ी के अलावा पारंपरिक आभूषणों में—नथनी गला-नु हार (हार),कान-नी-बुट्टी (झुमका),बाजूबंद,कमरबंद इन आभूषणों से सुसज्जित माता गौरा का स्वरूप अद्भुत और अलौकिक दिखाई देगा। दुल्हन की तरह सजी गौरा जब बाबा के संग नगर भ्रमण पर निकलेंगी, तब श्रद्धालु उनके दिव्य रूप के दर्शन कर भावविभोर हो उठेंगे।

—काशी की कला का भी दिखेगा अनुपम स्पर्श

यद्यपि परिधान देश के विभिन्न प्रांतों से आए हैं, पर उन्हें अंतिम स्वरूप काशी के कलाकार दे रहे हैं। परिधानों की सिलाई, कढ़ाई और अलंकरण में स्थानीय कारीगरों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। आयोजन समिति के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया कि स्व. डॉ. कुलपति तिवारी स्वयं को परंपराओं का स्वामी नहीं, बल्कि संवाहक मानते थे। उनका विश्वास था कि काशी की परंपराएं राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर हैं। मंदिर के अधिग्रहण का दौर हो, कॉरिडोर निर्माण का समय या महामारी का संकट—हर परिस्थिति में उन्होंने परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने का संकल्प निभाया। उनका कहना था कि काशी की आस्था को बचाना ही सबसे बड़ा धर्म है। आज जब काशी वैश्विक मंच पर नए स्वरूप में प्रतिष्ठित है, तब उसकी आध्यात्मिक जड़ों को सींचने वाले ऐसे तपस्वी व्यक्तित्वों का योगदान स्मरणीय है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

Share this story