वाराणसी: पितृ पक्ष के पूर्णिमा श्राद्ध तिथि पर गंगा किनारे उमड़े श्रद्धालु, प्रतिपदा श्राद्ध से बढ़ेगी भीड़

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वाराणसी: पितृ पक्ष के पूर्णिमा श्राद्ध तिथि पर गंगा किनारे उमड़े श्रद्धालु, प्रतिपदा श्राद्ध से बढ़ेगी भीड़


- विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड और गंगा तट पर चहल-पहल, गंगा में बढ़ाव से श्रद्धालुओं को परेशानी

वाराणसी,26 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा शनिवार से हो गईं। पितृपक्ष में पूर्णिमा श्राद्ध पर बारिश के बीच श्रद्धालुओं ने गंगातट सहित अनादि विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म किया। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्रद्धालुओं ने विधि विधान से कर्मकांडी ब्राह्मणों की सहायता से परम्परागत रूप से पितरों का तर्पण किया। पूर्णिमा श्राद्ध तिथि पर अपने मातृकुल के पितरों-नाना, नानी, परनाना, परनानी-का तर्पण किया गया।

पितृपक्ष के प्रतिपदा श्राद्ध रविवार से श्रद्धालुओं की भीड़ शहर में बढ़ेगी। प्रतिप्रदा श्राद्ध के लिए हजारों श्रद्धालु शनिवार को ही शहर में आ गए। रविवार को तड़के से ही गंगा तट और अनादि विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करने वालों की भारी भीड़ उमड़ेगी। देश के कोने-कोने से वाराणसी आए श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करेंगे। अकाल मृत्यु को प्राप्त पूर्वजों के लिए श्रद्धालु कर्मकांडी ब्राह्मणों की सहायता से त्रिपिंडी श्राद्ध भी कराएंगे।

विमल तीर्थ पर हजारों वर्षों से होती आ रही परंपरा

पिशाचमोचन कुंड स्थित शेरवाली कोठी के वयोवृद्ध कर्मकांडी पंडित श्रीकांत मिश्र और प्रदीप पांडेय ने शनिवार को बताया कि अनादि विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्ध करने की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। इसका उल्लेख स्कंद महापुराण और गरुड़ पुराण में भी मिलता है। मान्यता है कि इस कुंड पर तर्पण करने से पितृ दोष का शमन होता है और पूर्वजों की आत्मा को परम शांति प्राप्त होती है। कर्मकांडी ब्राम्हणों के अनुसार, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तब पितृलोक पृथ्वीलोक के सबसे निकट आता है। इस दौरान किया गया श्राद्ध विशेष फलदायी होता है।

तीन पीढ़ियों तक के पितरों का किया जाता है तर्पण

श्राद्ध कर्म में पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता, मातामह, प्रमातामह — तीन-तीन पीढ़ियों तक के पितरों का तर्पण किया जाता है। कर्मकांडी पंडित प्रदीप पांडेय के अनुसार, तर्पण करते समय हाथों में जल, काला तिल और कुश लेकर अंगूठे व तर्जनी के मध्य से जल को गिराते हुए ‘ॐ पितृभ्यः स्वधायैभ्यः स्वधा नमः’ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। माना जाता है कि तर्पण और श्राद्ध कर्म से पितृदोष से मुक्ति के साथ पितरों की आत्मा भी तृप्त होती है। तर्पण न करने से पितरों को मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा भी मृत्यु लोक में भटकती है। ऐसे में पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया जाता है।

सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगा श्राद्ध पक्ष

पितृ पक्ष की यह पुण्य अवधि 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ संपन्न होगी। जिन लोगों को अपने पितरों की पुण्यतिथि ज्ञात नहीं है, वे पूरे पखवाड़े प्रतिदिन तर्पण करते हैं और अंतिम दिन पितृ विसर्जन करते हैं। सनातन धर्म की मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधानपूर्वक किया गया श्राद्ध कर्म पूर्वजों को तृप्त करता है। पितरों की प्रसन्नता से वंश वृद्धि, सुख-शांति और सिद्धि प्राप्त होती है। प्रत्येक वंशज को कम से कम तीन बार त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य कराना चाहिए।

पितृपक्ष में श्राद्धतिथि

पितृपक्ष में प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर रविवार, द्वितीया 28 सितंबर सोमवार और तृतीया 29 सितंबर, मंगलवार को होगा चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध 30 सितंबर बुधवार को, षष्ठी 01 अक्टूबर गुरुवार को, सप्तमी 02 अक्टूबर शुक्रवार को और अष्टमी 03 अक्टूबर शनिवार को होगा।

इसी तरह नवमी का श्राद्ध 04 अक्टूबर रविवार, दशमी 05 अक्टूबर सोमवार और एकादशी 06 अक्टूबर मंगलवार को होगा। द्वादशी 07 अक्टूबर बुधवार, त्रयोदशी 08 अक्टूबर गुरुवार और चतुर्दशी 09 अक्टूबर शुक्रवार को होगी। पितृपक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ 10 अक्टूबर शनिवार को होगा। खास बात यह है कि इस बार पितृपक्ष 2026 में तिथि के क्षय (घटने) के कारण 30 सितंबर 2026 को चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन बुधवार को होगा।

पंचागों के अनुसार इस साल चतुर्थी तिथि 30 सितंबर 2026, दोपहर 2 बजकर 55 मिनट तक रहेगी। और इसके तुरंत बाद पंचमी तिथि लग जाएगी, जो अगले दिन 01 अक्तूबर 2026 को दोपहर के कुतुप और रौहिण मुहूर्त से पहले ही समाप्त हो जाएगी। सनातन धर्म में श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर के समय ही किया जाता है। इसी वजह से इस साल चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध दोनों 30 सितंबर की दोपहर को ही किया जाएगा। इसके चलते पितृपक्ष 16 के बजाय 15 दिनों का हो गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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