बीएचयू ने अनुसंधान में नई उपलब्धि हासिल की, उद्योगों को दिया दो प्रौद्योगिकियों का लाइसेंस

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बीएचयू ने अनुसंधान में नई उपलब्धि हासिल की, उद्योगों को दिया दो प्रौद्योगिकियों का लाइसेंस


वाराणसी,18 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने अपने अनुसंधान को समाजोपयोगी बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। विश्वविद्यालय ने अपनी विकसित दो प्रौद्योगिकियों के लाइसेंस हस्तांतरण के लिए दो प्रमुख उद्योग संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं।

मुम्बई स्थित एमआरसी एग्रोटेक लिमिटेड के साथ गेहूँ की उन्नत किस्म और बेंगलुरु की इंडियन हेल्थ सिस्टम्स (आईएचएस) के साथ आयुर्वेद आधारित स्वास्थ्य आकलन टूल के लाइसेंस हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हुई है। कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी के मौजूदगी में कुलसचिव राजन श्रीवास्तव ने दोनों कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए। इसके अतिरिक्त कृषि विज्ञान संस्थान एवं आयुर्वेद संकाय के वैज्ञानिक एवं अन्य सदस्य भी उपस्थित रहे। इन सहयोगात्मक प्रयासों का समन्वय विश्वविद्यालय के बौद्धिक संपदा अधिकार एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्रकोष्ठ द्वारा किया गया है।

यह जानकारी बीएचयू के जनसम्पर्क अधिकारी ने शनिवार को दी। उन्होंने बताया कि यह प्रकोष्ठ विश्वविद्यालय के अनुसंधान एवं नवाचार को उद्योग एवं कॉरपोरेट जगत से जोड़ने, उन्हें समाज तक पहुंचाने और जनकल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कार्यरत है।

कुलपति प्रो.अजित कुमार चतुर्वेदी के अनुसार, विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच इस तरह का सहयोग नवाचार और राष्ट्रीय विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। हमें चाहिए कि हम अपने अनुसंधान को व्यावसायिक लाभ से परे, समाजहित में उपयोगी बनाएं और उसके लाभों को जनसामान्य तक पहुंचाएं। उन्होंने औद्योगिक संस्थानों से रचनात्मक सुझावों का आग्रह किया ताकि अनुसंधान के परिणाम और अधिक प्रभावी और उपयोगी हो सकें। प्रो. चतुर्वेदी ने बताया कि बीएचयू में संचालित बायोनेस्ट और साथी जैसी पहलें नवाचार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और उद्योग-अकादमिक सहयोग को निरंतर प्रोत्साहित कर रही हैं।

उन्हाेंने बताया कि कृषि विज्ञान संस्थान के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग द्वारा विकसित गेहूँ की उन्नत किस्म, एचयूएम 838 (मालवीय 838), ने विभिन्न लोकप्रिय प्रचलित किस्मों की तुलना में अधिक उत्पादन क्षमता और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदर्शित की है। यह किस्म कृत्रिम परिस्थितियों में गेहूँ के ब्लास्ट रोग, रतुआ रोग जैसे तीनों प्रमुख रोगों के प्रति पूर्णतः प्रतिरोधी है। इसके अतिरिक्त, यह करनाल बंट और पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति भी प्रतिरोधी है। सूखे क्षेत्रों में भी यह अधिक उत्पादन देने में सक्षम है, जबकि इसकी उच्च प्रोटीन मात्रा (11.8 फीसद) और उत्कृष्ट चपाती बनाने की गुणवत्ता इसे विशेष बनाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे किसानों के लिए समर्पित कर दिया है। इस किस्म का विकास प्रो. वी.के. मिश्रा, डॉ. हेमंत कुमार जायसवाल, डॉ. संदीप शर्मा, स्वर्गीय डॉ. रमेश कुमार सिंह समेत कई वैज्ञानिकों ने किया है।

एमआरसी एग्रोटेक लिमिटेड के सीईओ अशोक कुमार सिंह ने इस गेहूँ की किस्म के लाइसेंस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस साझेदारी से किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज और रोग प्रतिरोधी उन्नत किस्में उपलब्ध कराई जा सकेंगी। आयुर्वेद संकाय के क्रियाशरीर विभाग ने 'अग्निबाला' स्व-मूल्यांकन उपकरण विकसित किया है, जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपनी पाचन और चयापचय क्षमता का स्वयं आकलन कर सकता है। यह उपकरण जीवनशैली, भोजन और पाचन संबंधी कारकों का समेकित मूल्यांकन करता है। आयुर्वेद के अनुसार, सामान्य अग्नि स्वस्थ जीवन का आधार है, और इसका विकृत होना कई रोगों का कारण बन सकता है।

इंडियन हेल्थ सिस्टम्स के सीईओ डॉ. एम. के. विवेक शंकर ने बताया कि उनकी संस्था ने एचपीओडी(hPod) नामक स्वास्थ्य स्व-मूल्यांकन उपकरण विकसित किया है, जिसमें आयुर्वेद आधारित स्वास्थ्य आकलन को भी शामिल किया जाएगा। इस उपकरण का विकास डॉ. अपर्णा सिंह और प्रो. संगीता गेहलोत के निर्देशन में हुआ है, और इसका सांख्यिकीय विश्लेषण डॉ. गिरीश सिंह ने किया है। इस शोध को जर्नल ऑफ एविडेंस बेस्ड इंटीग्रेटिव मेडिसिन में प्रकाशित किया जा चुका है।

प्रो. बिरंची कुमार सरमा ने कहा कि इन समझौतों के माध्यम से विश्वविद्यालय के नवाचार, किसानों, स्वास्थ्य क्षेत्र और आम जनता तक पहुंच सकेंगे। यह पहल विश्वविद्यालय को एक मजबूत नवाचार केंद्र बनाने में सहायक होगी।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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