बीएचयू में शोध, प्राचीन पौधों में मौसमी तनाव से जूझने की रणनीतियां उजागर

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— वनस्पति विज्ञान विभाग में कार्यरत शोध टीम ने किया संयुक्त अध्ययन

वाराणसी, 04 मई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए गए एक संयुक्त बहुसंस्थागत अध्ययन ने प्राचीन पौधों की उन रणनीतियों का खुलासा किया है, जिनकी मदद से वे कठोर मौसमी बदलावों के बीच भी जीवित रहते हैं। लगभग एक दशक तक चले इस शोध के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं प्लांट मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिपोर्टर, (स्प्रिंगर नेचर) तथा जर्नल ऑफ ब्रायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह बताता है कि बदलते मौसम में पौधे किस प्रकार अपने जैविक तंत्र को अनुकूलित करते हैं। बीएचयू के विज्ञान संस्थान के वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. योगेश मिश्रा के नेतृत्व में हुई इस रिसर्च में लिवरवर्ट्स (प्राचीन पादप समूह) की अनुकूलन क्षमता का गहन विश्लेषण किया गया।

शोध में मेघालय जैसे पारिस्थितिक क्षेत्रों में पाई जाने वाली दो प्रजातियों डुमोर्टिएरा हिर्सूटा और प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम का अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने इन पौधों के जीन अभिव्यक्ति और प्रोटीन प्रोफाइल को चार अलग-अलग मौसमों-मानसून पूर्व, मानसून, मानसून पश्चात और फलन काल—के दौरान जांचा। अध्ययन के अनुसार, डुमोर्टिएरा हिर्सूटा अनुकूल परिस्थितियों में तेजी से वृद्धि और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करती है, जबकि प्रतिकूल समय में ऊर्जा को संरक्षित कर तनाव से मुकाबला करती है। दूसरी ओर, प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम अपेक्षाकृत स्थिर और दीर्घकालिक रणनीति अपनाती है, जिससे वह लंबे समय तक पर्यावरणीय दबावों को सहन कर पाती है। प्रोटियोमिक और जैव-रासायनिक विश्लेषण से यह भी सामने आया कि दोनों प्रजातियां तनावपूर्ण मौसम में रक्षा-संबंधी प्रोटीनों को बढ़ाती हैं और वृद्धि तथा प्रकाश-संश्लेषण से जुड़े प्रोटीनों को कम करती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में ये पौधे अपनी ऊर्जा को वृद्धि के बजाय जीवित रहने पर केंद्रित करते हैं।

शोध में यह भी पाया गया कि प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम में कठोर मौसम के दौरान ऑक्सीडेटिव तनाव के संकेत बढ़ जाते हैं, जबकि मानसून के समय क्लोरोफिल की मात्रा अधिकतम रहती है। इसके साथ ही, सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज (एसओडी) जैसे एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम की सक्रियता भी बढ़ती है, जो पौधों को नुकसान से बचाने में मदद करती है।

डॉ. मिश्रा ने बताया कि उनकी टीम अब डुमोर्टिएरा हिर्सूटा की ट्रांसजेनिक लाइनों के विकास पर काम कर रही है। इससे इसे भारत की एक नई मॉडल ब्रायोफाइट प्रणाली के रूप में स्थापित करने और तनाव-संबंधी जीनों के कार्यात्मक विश्लेषण में मदद मिलेगी।

इस शोध में बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया, देहरादून एवं शिलांग, नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, शिलांग तथा के.टी.एच. रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, स्वीडन का सहयोग प्राप्त हुआ। प्रमुख सहयोगियों में डॉ. एस.के. सिंह, डॉ. नेहा चौरसिया और डॉ. वैभव श्रीवास्तव शामिल रहे। यह खोज भविष्य में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल फसलों के विकास और पौधों की सहनशीलता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकती है। यह शोध डॉ. योगेश मिश्रा और उनकी टीम में संध्या यादव, सुवाजीत बसु, विशाल कुमार झा, आकांक्षा श्रीवास्तव, शुभंकर बिस्वास, राजू मंडल और कृतिका त्रिपाठी द्वारा किया गया।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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