एपिलेप्सी न्यूरोलॉजिकल विकार से मस्तिष्क में असामान्य विद्युत गतिविधि के कारण बार-बार पड़ते हैं दौरे
—आईएमएस-बीएचयू में ‘साइकोजेनिक एपिलेप्सी’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन
वाराणसी, 08 मार्च (हि.स.)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान न्यूरोलॉजी विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय “साइकोजेनिक एपिलेप्सी” विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन रविवार को हुआ।
संस्थान के के. एन. उड़प्पा सभागार में दो दिन तक चले सम्मेलन में देश-विदेश से आए न्यूरोलॉजी और साइकोलॉजी के दो दर्जन से अधिक विशेषज्ञों ने इस जटिल न्यूरोलॉजिकल और मनोवैज्ञानिक समस्या पर नवीन शोध के साथ चुनौतियों को भी साझा किया। सम्मेलन में साइकोजेनिक नॉन-एपिलेप्टिक सीजर्स के कारण, लक्षण, निदान और उपचार पर विस्तृत चर्चा हुई।
—क्या होते हैं सीजर्स
विशेषज्ञों के अनुसार सीजर मस्तिष्क में अचानक होने वाली अनियंत्रित विद्युत गतिविधि के कारण उत्पन्न होता है। जिससे व्यक्ति के व्यवहार, शारीरिक गतिविधियों, संवेदनाओं या चेतना में अचानक बदलाव आ सकता है। एपिलेप्सी एक न्यूरोलॉजिकल विकार है । जिसमें मस्तिष्क में असामान्य विद्युत गतिविधि के कारण बार-बार दौरे पड़ते हैं। इन दौरों की अवधि और तीव्रता अलग-अलग हो सकती है—कुछ सेकंड से लेकर कई मिनट तक। विशेषज्ञों ने बताया कि सीजर्स के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें— एपिलेप्सी,सिर में गंभीर चोट,मस्तिष्क संक्रमण (मेनिन्जाइटिस/एन्सेफलाइटिस), स्ट्रोक, आनुवंशिक कारण, मेटाबॉलिक असंतुलन (जैसे हाइपोग्लाइसीमिया, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन),ब्रेन ट्यूमर, दवाओं का अचानक बंद होना या नशे का प्रभाव है।
—क्या है साइकोजेनिक नॉन-एपिलेप्टिक सीजर्स
विशेषज्ञों ने बताया कि इस रोग में ऐसे दौरे होते हैं जो देखने में एपिलेप्सी के दौरे जैसे लगते हैं, लेकिन इनमें मस्तिष्क में असामान्य विद्युत गतिविधि नहीं होती। ये मुख्यतः मनोवैज्ञानिक कारणों से उत्पन्न होते हैं। अक्सर इसका सही निदान देर से हो पाता है। जिससे मरीजों को लंबे समय तक गलत उपचार मिल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार पीएनईएस गैर-एपिलेप्टिक घटनाओं में सबसे सामान्य है। एपिलेप्सी सर्जरी के लिए संदर्भित मरीजों में लगभग 20 से 30 प्रतिशत मामलों में पीएनईएस पाया जाता है। इसकी अनुमानित घटना दर 1.5 से 3 प्रति लाख प्रति वर्ष है, जबकि सामान्य आबादी में इसकी प्रचलन दर 2 से 33 प्रति लाख तक हो सकती है। इस रोग के अधिकांश मामले महिलाओं में पाए जाते हैं और इनकी शुरुआत अक्सर युवावस्था में होती है।
सम्मेलन में बताया गया कि इस रोग का उपचार मुख्य रूप से मनोचिकित्सीय और मनोवैज्ञानिक उपचार पद्धतियों से किया जाता है। कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी), मनोचिकित्सा, समूह और पारिवारिक परामर्श इसके प्रभावी उपचार माने जाते हैं। यदि मरीज को एपिलेप्सी नहीं है तो एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं को धीरे-धीरे बंद करने की सलाह दी जाती है।
इसके पहले सम्मेलन का उद्घाटन बीते शनिवार को आईएमएस-बीएचयू के निदेशक एवं डीन (मेडिसिन) प्रो. सत्य नारायण संखवार की अध्यक्षता में हुआ। इस अवसर पर प्रो. मीना गुप्ता बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं, जबकि विशिष्ट अतिथि प्रो.टी.बी. सिंह,प्रो. संजय गुप्ता,और डॉ. अभिषेक पाठक के रूप में मौजूद रहे। कार्यक्रम का संयोजन न्यूरोलॉजी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर विजयनाथ मिश्र ने किया।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

