आचार्य परशुराम के जीवन का ध्येय थी संत साहित्य की साधना : कुलपति
—आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की जयंती पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में संगोष्ठी
वाराणसी,25 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के हिन्दी विभाग में शनिवार को हिन्दी के साहित्यकार, आलोचक एवं संत साहित्य के अध्येता आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की जयंती उल्लासपूर्ण माहौल में मनाई गई। जयंती पर विभाग में आयोजित संत साहित्य के अध्ययन की परंपरा और आचार्य परशुराम चतुर्वेदी विषयक गोष्ठी में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के बहुआयामी साहित्यिक एवं वैचारिक अवदान पर चर्चा हुई। गोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि यदि आचार्य परशुराम चतुर्वेदी को सही अर्थों में समझना है तो उनके जीवन में 'साधना' के वास्तविक अर्थ को समझना होगा। उन्होंने कहा कि वकालत उनकी आजीविका का माध्यम अवश्य थी, किंतु संत साहित्य का अध्ययन, अनुसंधान और लेखन ही उनके जीवन का मूल ध्येय था। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के पौत्र होने के नाते कुलपति ने अपने बाबा से जुड़ी आत्मीय स्मृतियाँ साझा करते हुए कहा कि उन्हें लगभग पंद्रह वर्षों तक उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ और मेरे लिए ये अत्यंत गर्व का विषय है। कुलपति ने सुझाव दिया कि आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की साहित्यिक विरासत केवल हिंदी जगत की धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा की अमूल्य निधि है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना हम सभी का दायित्व है एवं इसे पुनः प्रकाशित किया जाना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि प्रो. सुषमा घिल्डियाल (संकाय प्रमुख, कला संकाय) ने कहा कि संत साहित्य भारतीय समाज की समावेशी चेतना का प्रतिनिधि साहित्य है। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने जिस निष्पक्षता और अकादमिक गंभीरता के साथ संत परंपरा का मूल्यांकन किया, वह हिन्दी आलोचना की अमूल्य धरोहर है। कार्यक्रम की संयोजक प्रो. श्रद्धा सिंह ने गोष्ठी की विषय-प्रस्तावना रखते हुए कहा कि आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का साहित्यिक योगदान केवल हिन्दी साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनर्पाठ का एक सशक्त आधार है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. राजकुमार ने की। अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों का दायित्व केवल ज्ञान का प्रसार करना नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपराओं के पुनर्पाठ और पुनसृजन का वातावरण तैयार करना भी है।
प्रो. सदानंद शाही ने कबीर साहित्य की परख” पर अपने व्याख्यान में कहा कि आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने कबीर को वृहत्तर परिधि में देखा है। कबीर परशुराम चतुर्वेदी के लिए एक स्थापित मानक हैं। वे सहजता व सरलता के साथ भारतीय नागरिक में संतत्व का एक ढाँचा रचते हैं। प्रो. आशीष त्रिपाठी ने उत्तरी भारत की संत परंपरा” पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि संत साहित्य भारतीय लोकजीवन की संवेदना और मानवीय मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है।
प्रो. वशिष्ठ अनूप द्विवेदी ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा कि आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का समग्र साहित्य भारतीय सांस्कृतिक विरासत की वैज्ञानिक व्याख्या का उत्कृष्ट उदाहरण है। कार्यक्रम का संचालन प्रो. नीरज खरे व प्रो. प्रभाकर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रेषित किया। कार्यक्रम में प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. प्रभाकर सिंह सहित विश्वविद्यालय के अन्य शिक्षक, शोधार्थी,छात्र उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

