‘टाइपो-पिकनिक’: बीएचयू एप्लाइड आर्ट्स विभाग ने काशी की गलियों में टाइपोग्राफी की लगाई जीवंत पाठशाला
वाराणसी, 15 अप्रैल (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के दृश्य कला संकाय अंतर्गत एप्लाइड आर्ट्स विभाग ने बुधवार को ‘टाइपो-पिकनिक’ नामक एक अभिनव स्ट्रीट-आधारित टाइपोग्राफी कार्यशाला का आयोजन किया। यह पहल ‘टाइपोयात्रा’ कैलिग्राफी एवं टाइप डिजाइन कार्यशाला श्रृंखला के तहत आयोजित की गई। इसका उद्देश्य छात्रों को वास्तविक जीवन के दृश्य परिवेश में टाइपोग्राफी की समझ विकसित करना था।
कार्यक्रम में लगभग 50 छात्रों ने डॉ. अभिषेक वर्धन सिंह के मार्गदर्शन में गोदौलिया चौराहा से दशाश्वमेध घाट तक तीन घंटे की वॉक में भाग लिया। इस दौरान छात्रों ने काशी के व्यस्त बाज़ारों में प्रचलित वर्नाक्युलर टाइपोग्राफी का सूक्ष्म अध्ययन किया। विभागाध्यक्ष प्रो. मनीष अरोड़ा के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यशाला में प्रतिभागियों ने हाथ से लिखे साइनबोर्ड, देवनागरी और लैटिन लिपि के मिश्रण वाले बोर्ड, तथा स्थानीय बाज़ारों की दृश्य भाषा का विश्लेषण किया। अध्ययन के दौरान लेटरफॉर्म विकृति, टाइपोग्राफिक हायरार्की के उलटाव और अनियोजित दृश्य परिवेश में अक्षरों के सह-अस्तित्व जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया।
विशेष रूप से ‘एकम काशी’ के संस्कृत-अंग्रेज़ी द्विभाषी साइनबोर्ड को सुविचारित टाइपोग्राफी के एक दुर्लभ उदाहरण के रूप में रेखांकित किया गया। डॉ. अभिषेक वर्धन सिंह ने बताया कि इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य अक्षरों को उनकी संरचनात्मक तर्क प्रणाली, सामग्री, सतह उपचार, स्थानिक व्यवस्था और कार्यात्मक संदर्भ के आधार पर समझना था। साथ ही, भारतीय वर्नाक्युलर टाइपोग्राफी की हाइब्रिड प्रकृति को पहचानने पर भी बल दिया गया।
प्रो. मनीष अरोड़ा ने कहा, “यह शहर सदियों से टाइपोग्राफी सिखाता आ रहा है। हमने केवल छात्रों को वह दृष्टि दी है, जिससे वे दीवारों पर लिखी भाषा को पढ़ सकें। ‘टाइपो-पिकनिक’ जीवन के बीच सीखने का एक सशक्त माध्यम है।” यह पहल एक ऐसी शिक्षण पद्धति को रेखांकित करती है, जिसमें कक्षा से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन के अनुभवों के माध्यम से सीखने को प्राथमिकता दी जाती है। वाराणसी की सड़कों पर प्रत्यक्ष अवलोकन के जरिए छात्रों ने अक्षरों को केवल डिज़ाइन तत्व नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की दृश्य संस्कृति के अभिन्न हिस्से के रूप में समझा।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

