समुद्री अवसादों में छिपे जलवायु परिवर्तन के संकेतों का वैज्ञानिकों ने किया खुलासा

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समुद्री अवसादों में छिपे जलवायु परिवर्तन के संकेतों का वैज्ञानिकों ने किया खुलासा


अंतरराष्ट्रीय शोध में बीएचयू के वैज्ञानिकों की अहम भागीदारी, ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित निष्कर्ष

वाराणसी, 27 फरवरी (हि.स.)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विज्ञान संस्थान के भौमिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने अंतरराष्ट्रीय शोध दल के साथ मिलकर समुद्री अवसादों में संरक्षित लाखों वर्षों पुराने जलवायु परिवर्तनों के रहस्यों को उजागर किया है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन में ब्रिटेन, पुर्तगाल, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, जापान, चीन और स्पेन के वैज्ञानिक भी शामिल रहे। बीएचयू के प्रोफेसर अरुण देव सिंह ने अंतरराष्ट्रीय महासागरीय ड्रिलिंग अभियान 339 के तहत पुर्तगाल तट से दूर गहरे समुद्र में संचित अवसादों का विस्तृत विश्लेषण किया। इन अवसादों में पृथ्वी के प्राचीन जलवायु इतिहास का दीर्घकालिक रिकॉर्ड सुरक्षित है। अध्ययन से पता चला कि अटलांटिक महासागर में प्रवेश करने वाले गर्म और खारे भूमध्यसागरीय जल का प्रवाह जब ठंडे व अपेक्षाकृत ताजे जल से टकराता है, तो गहरे महासागरीय परिसंचरण की संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। शोध के अनुसार, भूमध्यसागरीय बहिर्वाह जल ने उत्तरी अक्षांशों तक गर्म, खारे जल की आपूर्ति कर अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) को प्रभावित करने में सक्रिय भूमिका निभाई। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बहिर्वाह की तीव्रता और मार्ग प्लेट विवर्तनिकी में होने वाले परिवर्तनों से नियंत्रित होते रहे हैं। यह निष्कर्ष दर्शाता है कि महासागरीय धाराओं, प्लेटों की गति और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के बीच गहरा और द्विदिश संबंध मौजूद है। इसी क्रम में हाल ही में संपन्न अंतरराष्ट्रीय महासागरीय ड्रिलिंग अभियान 397 में विभाग की भूवैज्ञानिक डॉ. कोमल वर्मा भी शामिल रहीं। इस अभियान के तहत पिछले 25 लाख वर्षों यानी चतुर्युगी काल के दौरान उत्तरी गोलार्ध में हिम चादरों के बार-बार विस्तार और संकुचन का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि लगभग 27 लाख वर्ष पूर्व हिम चादरों के बड़े विस्तार ने पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में निर्णायक मोड़ लाया।

अभियान से प्राप्त अवसादी अभिलेखों के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइंस में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन में संकेत मिला है कि उस कालखंड में मात्र लगभग एक हजार वर्षों जैसे अपेक्षाकृत कम समय में तापमान में तीव्र उतार-चढ़ाव दर्ज किए गए। यह चरण सहस्राब्दी-स्तरीय अचानक जलवायु परिवर्तनशीलता की शुरुआत से मेल खाता है। शोधकर्ताओं ने अवसादों की रासायनिक संरचना का सूक्ष्म विश्लेषण किया। विशेष रूप से कैल्शियम, टाइटेनियम, ज़िरकोनियम और स्ट्रोंटियम जैसे तत्वों के अनुपात का अध्ययन कर यह समझने का प्रयास किया गया कि जलवायु परिवर्तन कितनी तीव्रता और गति से घटित हो रहे थे। प्रोफेसर अरुण देव सिंह के अनुसार, यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि क्षेत्रीय भूवैज्ञानिक घटनाएँ वैश्विक जलवायु प्रणालियों पर व्यापक और दूरगामी प्रभाव डाल सकती हैं। समुद्री अवसादों में संरक्षित यह साक्ष्य भविष्य में जलवायु परिवर्तन के आकलन और पूर्वानुमान के लिए भी महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेंगे। शोधकर्ताओं ने हिमखंडों द्वारा बहाकर लाए गए और उत्तरी अटलांटिक में जमा हुए चट्टानी टुकड़ों (बर्फ से बहकर आए मलबे) की परतों की भी पहचान की जो यह दर्शाते हैं कि विशाल हिम चादरें महासागर में फैल रही थीं और टूट रही थीं। उन्होंने यह भी समझा की समुद्र में समाप्त होने वाली ये बर्फ की चादरें समुद्री परिसंचरण को अस्थिर कर जलवायु में अचानक होने वाले इन बदलावों का कारण बन सकती हैं जिससे एक बार जब जलवायु में ये तीव्र परिवर्तन स्थापित हो गए तो ये चतुर्थक काल के दौरान हिमयुगों की एक नियमित विशेषता बन गए।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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