हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय प्रवासी समुदाय की सांस्कृतिक परंपरा और पहचान: प्रो. प्रियंका सोनकर

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हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय प्रवासी समुदाय की सांस्कृतिक परंपरा और पहचान: प्रो. प्रियंका सोनकर


बीएचयू की प्रोफेसर ने अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी की सांस्कृतिक पहचान बताई

वाराणसी,07 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. प्रियंका सोनकर ने अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के लॉस एंजिल्स शहर स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स में हिन्दी भाषा का मान बढ़ाया। बीते 27–28 फरवरी को आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रोफेसर डॉ. प्रियंका सोनकर ने विरासत भाषा के रूप में हिंदी की सांस्कृतिक पहचान और उसके संरक्षण विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। नेशनल हेरिटेज लैंग्वेज रिसोर्स सेंटर की ओर से आयोजित यह पांचवां अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था, जिसमें विश्व के विभिन्न देशों से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं और भाषा विशेषज्ञों ने अपनी-अपनी विरासत भाषाओं से संबंधित शोध और अनुभव साझा किए।

दो दिनों तक चले इस महत्वपूर्ण आयोजन में एक ही समय में 12 अलग-अलग कक्षों में समानांतर सत्र आयोजित किए गए, जिनमें विभिन्न देशों के प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं गई। यह जानकारी बीएचयू के जनसम्पर्क कार्यालय ने शनिवार को दी।

बीएचयू की ओर से बताया गया कि इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिंदी विषय पर प्रस्तुति देने वाली डॉ. प्रियंका सोनकर भारत से एकमात्र प्रतिभागी थीं। इस अवसर पर उन्होंने इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने शोध को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करने के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।

अपने वक्तव्य में प्रो. प्रियंका ने कहा कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय प्रवासी समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति, परंपरा और पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम है। विरासत भाषा के रूप में हिंदी नई पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने हिंदी के संरक्षण, शिक्षण और नई पीढ़ी तक इसके प्रभावी हस्तांतरण के लिए संस्थागत तथा सांस्कृतिक प्रयासों की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। इस संगोष्ठी में भागीदारी से विभिन्न देशों के विद्वानों के साथ संवाद और विचार-विमर्श का अवसर प्राप्त हुआ, जिससे विरासत भाषाओं के अध्ययन, शिक्षण और संरक्षण से जुड़े अनेक नए आयाम सामने आए।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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