अखाड़ा केवल कुश्ती का मैदान नहीं, काशी की जीवित सांस्कृतिक विरासत : प्रो. मनीष अरोड़ा
—‘अखाड़ा मिट्टी में लिखी देह का व्याकरण’ पर विशेष प्रस्तुति,स्वामीनाथ अखाड़े के पहलवान पप्पू और उनकी टीम का लाइव प्रदर्शन
वाराणसी, 18 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी की अखाड़ा संस्कृति केवल कुश्ती और शारीरिक व्यायाम की परंपरा नहीं, बल्कि मिट्टी, शरीर, अनुशासन, स्वदेशी उपकरण, गुरु-शिष्य परंपरा और सामुदायिक जीवन से निर्मित एक जीवंत सांस्कृतिक व्यवस्था है। इसी व्यापक दृष्टिकोण को केंद्र में रखते हुए क्रींडा 2026 के दूसरे दिन शुक्रवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय में “अखाड़ा : मिट्टी में लिखी देह का व्याकरण” विषय पर एक विशेष प्रस्तुति दी गई। प्रस्तुति प्रो. मनीष अरोड़ा, हेड,अप्लाइड आर्ट्स, फैकल्टी ऑफ़ विज़ुअल आर्ट्स बीएचयू ने की। क्रींडा 2026 का आयोजन 17 से 19 सितंबर के बीच शारीरिक शिक्षा कला संकाय के सेमिनार हाल में किया गया है। इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यह केवल स्क्रीन पर दिखाई गई तस्वीरों और विचारों तक सीमित नहीं रही। अखाड़ा संस्कृति को उसी के वास्तविक के माध्यम से मंच पर जीवंत किया गया।
——जब शोध-पत्र के भीतर ही जीवंत हो उठा अखाड़ा
प्रस्तुति के दौरान तुलसीघाट स्थित स्वामीनाथ अखाड़े से जुड़े पहलवान पप्पू और उनकी टीम विशेष रूप से उपस्थित रही। वे अपने साथ अखाड़े में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक उपकरण—जोड़ी, गदा, नाल, संतू आदि—लेकर आए और उनके उपयोग तथा अभ्यास का लाइव प्रदर्शन किया।
यही इस पूरे व्याख्यान का सबसे अप्रत्याशित, आश्चर्यजनक और जीवंत क्षण रहा। आमतौर पर किसी एकेडमिक कांफ्रेंस में किसी पारंपरिक खेल-संस्कृति पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया जाता है तो दर्शकों को उसके बारे में फोटोग्राफ ,स्लाइड और वर्रबल डिक्रिप्सन के माध्यम से जानकारी मिलती है। लेकिन यहां अखाड़े की संस्कृति को केवल बताया नहीं गया, बल्कि सामने लाकर दिखाया गया। पहलवानों के प्रत्यक्ष प्रदर्शन ने यह अनुभव कराया कि अखाड़े में इस्तेमाल होने वाले उपकरण केवल पुराने व्यायाम-साधन नहीं हैं। उनके पीछे शरीर की ताकत, संतुलन, लय, तकनीक, निरंतर अभ्यास और अनुशासन की एक पूरी ज्ञान-परंपरा मौजूद है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि शारीरिक गतिविधि और खेल-कूद की वास्तविक आवश्यकता को किसी सैद्धांतिक व्याख्या के बजाय शरीर के प्रत्यक्ष प्रदर्शन के माध्यम से समझाया गया। दर्शकों के सामने जब पहलवानों ने पारंपरिक उपकरणों के साथ अभ्यास और प्रदर्शन किया, तो प्रस्तुति का विषय अचानक एक जीवंत अनुभव में बदल गया।
——मिट्टी, शरीर, उपकरण और समाज—अखाड़े के चार आधार
प्रो. अरोड़ा की प्रस्तुति ने अखाड़े को चार प्रमुख आयामों—मिट्टी, शरीर, उपकरण और समाज—के माध्यम से समझने का प्रयास किया। इसमें बताया गया कि अखाड़ा केवल वह स्थान नहीं है जहाँ पहलवान कुश्ती लड़ते हैं। उसकी मिट्टी स्वयं प्रशिक्षण का माध्यम है, शरीर अभ्यास और अनुशासन का परिणाम है, पारंपरिक उपकरण को आगे बढ़ाते हैं और पूरा अभ्यास समुदाय के भीतर विकसित होता है। प्रस्तुति में अखाड़े की ऐतिहासिक यात्रा को भी सामने रखा गया—प्राचीन मल्ल-युद्ध और शारीरिक अभ्यास की परंपराओं से लेकर मध्यकालीन पहलवानी, औपनिवेशिक दौर में अखाड़ों की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका और आज तक काशी में जीवित इस परंपरा तक।
—काशी की मिट्टी में दर्ज एक लंबा इतिहास
प्रस्तुति में इस बात पर जोर दिया गया कि अखाड़े को केवल खेल के इतिहास के रूप में नहीं देखा जा सकता। काशी के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थित अखाड़े अपने स्थानीय परिवेश और समुदाय से जुड़े हुए हैं। तुलसी घाट, रामकुंड, बंगाली टोला, कज्जाकपुरा जैसे स्थानों का उल्लेख करते हुए प्रस्तुति में बताया गया कि स्थान बदलने के साथ अखाड़े की मिट्टी, वातावरण और सामुदायिक चरित्र भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाते हैं।
—जोड़ी और गदा से लेकर नाल तक—उपकरण भी हैं ज्ञान की भाषा
प्रस्तुति में पारंपरिक अखाड़ों में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को विशेष महत्व दिया गया। गदा, जोड़ी/मुगदर, नाल और कुंड जैसे उपकरण शरीर के विभिन्न आयामों—ताकत, संतुलन, नियंत्रण, सहनशक्ति और लय—के विकास से जुड़े हैं।
—गुरु-शिष्य परंपरा और प्रत्यक्ष सीखने की संस्कृति
अखाड़े की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक उसकी गुरु-शिष्य परंपरा है। प्रस्तुति में बताया गया कि अखाड़े में अभ्यास केवल व्यक्तिगत शक्ति अर्जित करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि गुरु की निगरानी, प्रत्यक्ष सीखने, लगातार अभ्यास और सामुदायिक अनुशासन से जुड़ी प्रक्रिया है।
इसी संदर्भ में पारंपरिक अखाड़े की तुलना आधुनिक जिम कल्चर से भी की गई—जहाँ मशीनें, डिजिटल प्लेटफार्म और आन लाइन वीडियो प्रशिक्षण का हिस्सा बन चुके हैं। अखाड़ा इसके बरक्स शरीर और गुरु के प्रत्यक्ष संवाद पर आधारित लर्निग सिस्टम प्रस्तुत करता है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

