डिजिटल युग में बच्चों और किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञों ने किया मंथन, कहा- समय रहते पहचान और उपचार जरूरी

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डिजिटल युग में बच्चों और किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञों ने किया मंथन, कहा- समय रहते पहचान और उपचार जरूरी


गोरखपुर, 25 अक्टूबर (हि.स.)। तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश, डिजिटल दुनिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते प्रभाव के बीच बच्चों और किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। शारीरिक और मानसिक विकास के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहे बच्चों एवं युवाओं के लिए बदलती परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाना कई बार कठिन हो जाता है। इसका असर उनके व्यवहार, भावनाओं, पढ़ाई और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में मानसिक समस्याओं की समय रहते पहचान, उचित परामर्श और प्रभावी उपचार बेहद जरूरी है।

इन्हीं महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श के लिए एसोसिएशन ऑफ क्लिनिकल साइकियाट्री सोसाइटी का दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन UPIPS-2026 गोरखपुर स्थित होटल रेडिसन ब्लू में आयोजित किया गया। सम्मेलन की थीम ‘यंग माइंड इन ट्रांजिशन : फ्रॉम अवेयरनेस टू एक्शन’ रखी गई। इसमें देश और प्रदेश के प्रतिष्ठित मनोरोग विशेषज्ञों ने बच्चों, किशोरों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों, उनकी पहचान, उपचार तथा बचाव के उपायों पर विस्तार से चर्चा की।

सम्मेलन में मुख्य अतिथि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर की निदेशक डॉ. विभा दत्ता तथा विशिष्ट अतिथि महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव उपस्थित रहे। सम्मेलन में डॉ. सीबी मधेसिया, डॉ. अभिनव श्रीवास्तव, डॉ. राम शरण, डॉ. एसएन गुप्ता, डॉ. गोपाल अग्रवाल, डॉ. प्रभात अग्रवाल, डॉ. मनोज पृथ्वीराज, डॉ. समंत सिंह, डॉ. ऋचा त्रिपाठी और डॉ. वर्तिका पाण्डेय सहित अनेक चिकित्सकों एवं विशेषज्ञों ने सहभागिता की।

विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों को केवल जिद, अनुशासनहीनता या पढ़ाई में अरुचि मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। चिड़चिड़ापन, लगातार उदास रहना, अकेले रहने की प्रवृत्ति, पढ़ाई में रुचि कम होना और सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना कभी-कभी मानसिक परेशानी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर बच्चों से संवाद करना और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी है।

युवाओं में आत्महत्या की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय

किशोरों और युवाओं में आत्महत्या की घटनाएं समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े करती हैं। ऐसी घटनाओं के पीछे कई व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। कई बार युवा अपनी परेशानियों को समझने या व्यक्त करने में कठिनाई महसूस करते हैं। दूसरी ओर, अभिभावक और शिक्षक भी उनकी भावनात्मक पीड़ा को समय रहते पहचान नहीं पाते। एम्स, गोरखपुर के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पृथ्वीराज ने इस विषय पर अपने विचार रखते हुए मानसिक समस्याओं की पहचान और उनके प्रभावी समाधान के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

जटिल मनोरोगों के उपचार की नई विधाओं पर चर्चा

सम्मेलन के दूसरे सत्र में आगरा के वरिष्ठ परामर्श मनोरोग चिकित्सक डॉ. यूसी गर्ग ने जटिल मनोरोगों के उपचार की नई विधाओं पर चर्चा की। उन्होंने मनोरोगों के उपचार, मरीजों की जरूरत के अनुरूप चिकित्सा पद्धतियों और उपचार की प्रभावशीलता से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार रखे।

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि मनोरोगों के उपचार में मरीज की व्यक्तिगत परिस्थितियों, बीमारी की प्रकृति और उसकी जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक है। उचित चिकित्सकीय परामर्श, नियमित निगरानी और उपचार के प्रति जागरूकता से मरीजों को बेहतर सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।

इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ ही बच्चों, किशोरों और युवाओं की समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाने पर जोर देना रहा। सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर हुई चर्चाओं ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने तथा समय रहते विशेषज्ञों की सहायता लेने की आवश्यकता को रेखांकित किया।

सम्मेलन के समापन अवसर पर गोरखपुर के मनोरोग विशेषज्ञ एवं UPIPS-2026 के आयोजन सचिव डॉ. अभिनव श्रीवास्तव ने सभी अतिथियों, देश-प्रदेश से आए चिकित्सकों, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। सम्मेलन में डॉ. सीबी मधेसिया, डॉ. राम शरण, डॉ. एसएन गुप्ता, डॉ. गोपाल अग्रवाल, डॉ. प्रभात अग्रवाल, डॉ. समंत सिंह, डॉ. ऋचा त्रिपाठी और डॉ. वर्तिका पाण्डेय सहित अन्य चिकित्सकों की सहभागिता रही।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

Livevns.news Desk
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