सीतापुर में राजकीय सम्मान के साथ 'अग्निवीर' इंद्रजीत को दी गई विदाई

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सीतापुर में राजकीय सम्मान के साथ 'अग्निवीर' इंद्रजीत को दी गई विदाई


सीतापुर में राजकीय सम्मान के साथ 'अग्निवीर' इंद्रजीत को दी गई विदाई


सीतापुर में राजकीय सम्मान के साथ 'अग्निवीर' इंद्रजीत को दी गई विदाई


सीतापुर, 29 मार्च (हि.स.)। देश की सेवा में तैनात एक और जवान ने कर्तव्य पथ पर अपनी जान न्योछावर कर दी। सीतापुर के कोतवाली देहात क्षेत्र के पकरिया धापूपुर निवासी 23 वर्षीय अग्निवीर इंद्रजीत गुप्ता दो दिन पहले जम्मू-कश्मीर में ड्यूटी के दौरान शहीद हाे गये थे। रविवार दोपहर को जब उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, तो पूरा इलाका गम और गर्व के भाव में डूब गया।

इंद्रजीत गुप्ता जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में तैनात थे। शुक्रवार को अचानक सीने में तेज दर्द की शिकायत हुई, जिसके बाद उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। रविवार को जैसे ही तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, हर आंख नम हो गई। ‘भारत माता की जय’ और ‘इंद्रजीत अमर रहे’ के नारों से पूरा गांव गूंज उठा। आसपास के गांवों से उमड़ी भीड़ अपने लाल के अंतिम दर्शन के लिए बेकाबू सी नजर आई।

राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान नागेंद्र चौबे, अमर सिंह और रामचंद्र यादव सहित प्रशासनिक अधिकारियों ने पुष्पांजलि अर्पित की। मद्रास रेजिमेंट के जवानों ने सलामी देकर अपने साथी को अंतिम विदाई दी। अंतिम यात्रा के दौरान हर कदम पर देशभक्ति का जज्बा दिखाई दिया। गांव की गलियों में गूंजते नारों और नम आंखों ने बता दिया कि इंद्रजीत सिर्फ एक परिवार का बेटा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का गर्व थे।

इस मौके पर राज्यमंत्री सुरेश राही, पूर्व मंत्री रामहेत भारती, भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश शुक्ला, भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा वर्मा के पुत्र अनिमेष पटेल सहित कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि इंद्रजीत का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और उनका नाम हमेशा सम्मान से लिया जाएगा।

जुड़वां भाई को छोड़ गया इंद्रजीत, पिता बोले—दुख भी है, बेटे पर गर्व भी

इंद्रजीत गुप्ता आठ भाई-बहनों में से एक थे। तीन भाई और पांच बहनों वाले इस परिवार में इंद्रजीत और इंद्रपाल जुड़वां थे। चार बहनों की शादी हो चुकी है, जबकि एक बहन और तीनों भाइयों का विवाह अभी होना था। मां का साया पहले ही उठ चुका था, ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी उनके पिता अर्जुनलाल गुप्ता पर है। जवान बेटे के जाने का दुख उनकी आंखों में साफ दिखा, लेकिन शब्दों में गर्व भी झलकता रहा—“मेरा बेटा देश के काम आया।” गांव में कई घरों में चूल्हा नहीं जला। हर चेहरा गमगीन था, लेकिन दिल में एक ही भाव था—इंद्रजीत ने देश के लिए जो किया, वह हमेशा याद रखा जाएगा।

कंधा देने की होड़—हर कोई अपने लाल को आखिरी बार थामना चाहता था

अग्निवीर इंद्रजीत गुप्ता की अंतिम यात्रा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भावनाओं का सैलाब बन गई। जैसे ही उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा गांव की गलियों से गुजरा, हर व्यक्ति की आंखें नम हो उठीं। सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया, जब उन्हें कंधा देने के लिए लोगों में होड़ लग गई।

कोई उन्हें अपने बेटे की तरह विदा करना चाहता था, तो कोई भाई मानकर अंतिम बार कंधा देना चाहता था। युवा, बुजुर्ग, किसान—हर कोई बस एक ही इच्छा लिए आगे बढ़ रहा था कि “हम भी अपने वीर को कंधा दें।” उस पल गांव का हर व्यक्ति इंद्रजीत का अपना बन गया था। यह दृश्य बता रहा था कि इंद्रजीत सिर्फ एक परिवार का नहीं, पूरे गांव का बेटा था।

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हिन्दुस्थान समाचार / Mahesh Sharma

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