धन नहीं, धर्म और योग्यता है असली पहचान, रामकथा में दिया गया संस्कारों का संदेश
मीरजापुर, 06 जून (हि.स.)। हलिया क्षेत्र के प्रसिद्ध गड़बड़ा शीतला धाम में आयोजित शतचंडी महायज्ञ एवं संगीतमय रामकथा के चौथे दिन शनिवार को सीता-राम विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति रस में डूब गए और पूरा पंडाल जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठा।
परशुराम अखाड़ा प्रयागराज के तत्वावधान में चल रही रामकथा में यज्ञाचार्य धीरज द्विवेदी ने सीता स्वयंवर और भगवान श्रीराम के विवाह प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति और धार्मिक मूल्यों की शिक्षा बच्चों को परिवार और अभिभावकों से ही मिलती है। इसलिए माता-पिता को अपने बच्चों को संस्कार और धर्म की शिक्षा देने में विशेष रुचि लेनी चाहिए।
कथा वाचन के दौरान उन्होंने बताया कि मिथिला नरेश राजा जनक को खेत जोतते समय धरती से एक कन्या प्राप्त हुई थी, जिनका नाम सीता रखा गया। बाद में वही जनकपुरी की राजकुमारी बनीं। राजा जनक के पास भगवान शिव का दिव्य पिनाक धनुष था, जिसे कोई भी राजा हिला तक नहीं पाता था। तब जनक ने प्रण किया कि जो इस धनुष को तोड़ेगा, उसी के साथ सीता का विवाह करेंगे।
उन्होंने बताया कि स्वयंवर में देश-विदेश के अनेक राजा और राजकुमार पहुंचे, लेकिन सभी धनुष उठाने में असफल रहे। अंततः महर्षि विश्वामित्र के संकेत पर भगवान राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और धनुष भंग कर दिया। धनुष टूटते ही जनकपुरी जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठी। माता सीता ने भगवान राम के गले में जयमाला पहनाई और देवताओं ने पुष्पवर्षा कर इस दिव्य मिलन का स्वागत किया।
यज्ञाचार्य ने कहा कि राजा जनक ने विवाह के लिए धन-संपत्ति नहीं, बल्कि धर्म, चरित्र और वीरता को महत्व दिया। समाज को भी वैवाहिक संबंधों में धन के बजाय योग्य और संस्कारी जीवनसाथी को प्राथमिकता देनी चाहिए।
इस अवसर पर महेंद्र बाबा, पूर्व प्रधान शिव गरुड़ तिवारी, पूर्व मंडल अध्यक्ष ज्ञानेश्वर दुबे, दिनेश तिवारी, मंगलधारी मिश्र, ज्ञान शुक्ल सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / गिरजा शंकर मिश्रा

