विकसित भारत-2047 के लक्ष्य के साथ जमीनी हकीकत को समझना जरूरी : प्रो. रवींद्र जयभाये
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मानव भूगोल की प्रासंगिकता पर व्याख्यान, सतत विकास और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन पर भी हुई चर्चा
प्रयागराज, 28 अक्टूबर (हि.स.)। विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए विकास के आंकड़ों के साथ जमीनी हकीकत को समझना भी जरूरी है। देश की विकास योजनाओं को लोगों के जीवन, स्थानीय जरूरतों और अलग-अलग क्षेत्रों की परिस्थितियों से जोड़कर देखना चाहिए। मानव भूगोल विकास, पर्यावरण और राजनीतिक प्रक्रियाओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बातें सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर रवींद्र जी. जयभाये ने कहीं। वह बुधवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की व्याख्यान श्रृंखला के छठे कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
विकसित भारत के लक्ष्य और सतत विकास पर चर्चा
‘21वीं सदी के भारत में मानव भूगोल क्यों महत्वपूर्ण है’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में प्रो. जयभाये ने विकसित भारत-2047 की परिकल्पना, उसके प्रमुख आयामों और इससे लाभान्वित होने वाले लोगों पर चर्चा की। उन्होंने वर्ष 2047 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय को लगभग 15 हजार से 18 हजार अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने की आकांक्षा का उल्लेख किया। साथ ही, वर्तमान विकास संकेतकों की भावी लक्ष्यों से तुलना करते हुए सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में भारत की प्रगति का विश्लेषण किया।
उन्होंने कहा कि विकास की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए आंकड़ों के साथ जमीनी परिस्थितियों का आकलन भी आवश्यक है। केवल सांख्यिकीय उपलब्धियां विकास की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करतीं। यह देखना भी जरूरी है कि विकास का लाभ लोगों तक किस सीमा तक पहुंच रहा है।
पश्चिमी घाट के उदाहरण से समझाया क्षेत्रीय विकास
व्याख्यान में पश्चिमी घाट क्षेत्र का उदाहरण देते हुए प्रो. जयभाये ने शासन व्यवस्था, लोगों की आजीविका और पर्यावरण के बीच संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने क्षेत्रीय विकास को टिकाऊ बनाने के लिए इन तीनों के बीच संतुलन की आवश्यकता बताई। इसके अलावा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन और स्थानिक प्रतिनिधित्व पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि भौगोलिक दृष्टिकोण से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
कार्यक्रम इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव के संरक्षण में आयोजित किया गया। भूगोल विभागाध्यक्ष प्रो. ए.आर. सिद्दीकी संयोजक तथा प्रो. अश्वजीत चौधरी सह-संयोजक रहे। भूगोल व्याख्यान श्रृंखला की छठी कड़ी की समन्वयक डॉ. फरहाना खातून ने मुख्य वक्ता का परिचय कराया और उनके शैक्षणिक योगदानों की जानकारी दी।
व्याख्यान में मानव भूगोल के माध्यम से भारत की विकास संबंधी, पर्यावरणीय और राजनीतिक चुनौतियों को समझने के महत्व को रेखांकित किया गया। साथ ही, नीतियों और योजनाओं को आम लोगों के अनुभवों तथा विभिन्न क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया गया।
हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल

