वैदिक वाङ्मय और संस्कृत के ज्ञान से ही भारतीय ज्ञान परंपरा की समग्र समझ : प्रो. हृदय रंजन शर्मा

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वैदिक वाङ्मय और संस्कृत के ज्ञान से ही भारतीय ज्ञान परंपरा की समग्र समझ : प्रो. हृदय रंजन शर्मा


वैदिक वाङ्मय और संस्कृत के ज्ञान से ही भारतीय ज्ञान परंपरा की समग्र समझ : प्रो. हृदय रंजन शर्मा


इलाहाबाद विश्वविद्यालय में त्रिदिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी का शुभारंभ

प्रयागराज, 07 अक्टूबर (हि.स.)। वैदिक वाङ्मय, शास्त्रचिंतन और संस्कृत के ज्ञान के बिना भारतीय ज्ञानपरंपरा को समग्र रूप से समझना संभव नहीं है। भारतीय ज्ञानपरंपरा को जानने के लिए वैदिक वाङ्मय और संस्कृत की शास्त्रचिंतन परंपरा को समझना आवश्यक है। यह बात महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेदविद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन के उपाध्यक्ष एवं वैदिक विद्वान प्रो. हृदय रंजन शर्मा ने बुधवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आयोजित अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कही।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की ओर से कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव के संरक्षण और विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल प्रताप गिरि के नेतृत्व में तिलक भवन में तीन दिवसीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। ‘शास्त्रचिंतन परंपरा का मूल स्रोत-वैदिक वाङ्मय’ विषय पर आयोजित यह संगोष्ठी सात से नौ अक्टूबर तक चलेगी। इसका आयोजन महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेदविद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन और संस्कृत, पालि, प्राकृत एवं प्राच्यभाषा विभाग के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है।

उद्घाटन सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। महर्षि सान्दीपनि वेद विद्या प्रतिष्ठान से संबद्ध गुरुकुल के छात्रों ने वैदिक मंगलाचरण और संस्कृत विभाग के शोधार्थियों ने लौकिक मंगलाचरण प्रस्तुत किया। विश्वविद्यालय के संगीत विभाग के विद्यार्थियों ने कुलगीत और संस्कृत विभाग के विद्यार्थियों ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। इसके बाद अतिथियों का सम्मान किया गया।

वेद भारतीय ज्ञान-विज्ञान के मूल स्रोत : प्रो. ओम प्रकाश पांडेय

प्रतिष्ठान के पूर्व सचिव एवं बीज वक्ता प्रो. ओम प्रकाश पांडेय ने वेदों को भारतीय ज्ञान-विज्ञान का मूल स्रोत बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रों और विभिन्न विद्याओं की जड़ें वैदिक वाङ्मय में निहित हैं। वेद मानव जीवन, प्रकृति, समाज और सृष्टि के प्रति समग्र दृष्टि प्रदान करते हैं। उन्होंने ऋषि परंपरा द्वारा ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन की भूमिका पर भी प्रकाश डाला।

प्रो. राजेश्वर प्रसाद मिश्र ने भारतीय शास्त्र परंपरा के विकास में वेदों की आधारभूत भूमिका पर विचार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन और विभिन्न शास्त्रों की अनेक चिंतनधाराओं का आधार वैदिक वाङ्मय में मिलता है। वहीं प्रो. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने वैदिक ज्ञानपरंपरा की निरंतरता, संरक्षण और वर्तमान समय में उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऋषि मंत्रों के रचयिता नहीं, बल्कि मंत्रों के द्रष्टा थे।

विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल प्रताप गिरि ने कहा कि वैदिक वाङ्मय और शास्त्रचिंतन परंपरा का गहरा संबंध है। भारतीय शास्त्रचिंतन को समझने के लिए वैदिक वाङ्मय का अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों, शिक्षकों और शोधार्थियों का स्वागत किया।

इस अवसर पर संस्कृत विभाग की शोधपत्रिका ‘प्राच्यप्रभा’ का विमोचन भी किया गया। पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. प्रयाग नारायण मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापित किया। संचालन संगोष्ठी के संयोजक डॉ. संत प्रकाश तिवारी ने किया।

दो समानांतर सत्रों में हुआ अकादमिक विमर्श

दोपहर बाद दो समानांतर अकादमिक सत्र आयोजित किए गए। तिलक भवन में हुए प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. राम सुमेर यादव ने की। प्रो. देशबंधु शर्मा ने मुख्य वक्तव्य दिया, जबकि प्रो. सत्यकेतु और प्रो. वंदना द्विवेदी ने विशिष्ट वक्तव्य प्रस्तुत किए।

संस्कृत विभाग के ग्रंथागार में आयोजित दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. आशा गुप्ता ने की। डॉ. नौनिहाल गौतम ने मुख्य वक्तव्य दिया। डॉ. तहसीन मंडल और डॉ. सुबोधकांत मिश्र ने विशिष्ट वक्ता के रूप में विचार रखे।

तीन दिवसीय संगोष्ठी में वैदिक वाङ्मय, भारतीय दर्शन, विभिन्न शास्त्रों, ज्ञान-विज्ञान, भाषा-साहित्य और समकालीन जीवन में वैदिक चिंतन की उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा होगी। आयोजन में विश्वविद्यालय और विभिन्न संस्थानों के 300 से अधिक शिक्षक एवं शोधार्थी शामिल हुए।

हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल

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