पितृ पक्ष के अन्तिम दिन अमावस्या पर पूर्वजों का श्राद्ध पिंडदान कर दी गई विदाई

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पितृ पक्ष के अन्तिम दिन अमावस्या पर पूर्वजों का श्राद्ध पिंडदान कर दी गई विदाई


- तर्पण में हुई त्रुटि के लिए पूर्वजों से मांगा क्षमा,गाय, कुत्ता, कौवा को लगाया भोग

वाराणसी, 10 अक्टूबर (हि.स.)। पितृ पक्ष के अंतिम दिन आश्विन अमावस्या यानी पितृ विसर्जन के अवसर पर शनिवार को धर्मनगरी काशी में श्रद्धा और आस्था के साथ पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया गया। सनातनी परिवारों ने विधि-विधान से पितरों का पूजन कर उन्हें विदाई दी और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि एवं खुशहाली का आशीर्वाद मांगा। इस दौरान श्रद्धालुओं ने पितृ पक्ष के 15 दिनों में तर्पण अथवा तिलांजलि देने में हुई किसी भी चूक के लिए अपने पूर्वजों से क्षमा याचना भी की।

गंगा घाटों पर भोर से ही शुरू हुआ श्राद्ध-पिंडदान

पितृ विसर्जन अमावस्या पर गंगा के विभिन्न घाटों पर पिंडदान करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ भोर से ही उमड़ने लगी। सिंधिया घाट, दशाश्वमेध घाट, मीरघाट, अस्सी घाट, शिवाला घाट, राजघाट और पंचगंगा घाट पर बड़ी संख्या में लोगों ने अपने पूर्वजों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान किए। वहीं, पिशाचमोचन स्थित विमल तीर्थ कुंड पर भी पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।

श्रद्धालुओं ने मुंडन कराने के बाद गंगा में स्नान किया और विधि-विधान से तर्पण एवं पिंडदान किया। जिन परिवारों में किसी परिजन की अकाल मृत्यु हुई थी, उन्होंने उनकी आत्मा की शांति के लिए पिशाचमोचन तीर्थ पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए। इस दौरान परंपरा के अनुसार तेल और घोड़े का दान भी किया गया।

कुश, चावल, जौ और तिल मिश्रित जल से किया तर्पण

पितृ अमावस्या पर लोगों ने अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित्त श्राद्ध एवं पिंडदान किया। धार्मिक विधि के अनुसार श्रद्धालुओं ने अपने कुल और गोत्र का उल्लेख करते हुए गंगाजल हाथ में लेकर संकल्प लिया। श्राद्ध कर्म में कुश, चावल, जौ, तुलसी के पत्ते और सफेद पुष्प शामिल किए गए। इसके बाद तिल मिश्रित जल से तीन अंजुली अर्पित कर पूर्वजों का तर्पण किया गया।

अनुष्ठान के दौरान श्रद्धालुओं ने पितृ पक्ष में तर्पण अथवा तिलांजलि देने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगी। साथ ही पितरों से परिवार की सुख-शांति, उन्नति और सफल जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना की।

गाय, कुत्ते और कौवे को खिलाया पितरों के निमित्त भोजन

पिंडदान और तर्पण के बाद श्रद्धालुओं ने गाय, कुत्ते और कौवे को पितरों के निमित्त भोजन कराया। इसके बाद लोग घर पहुंचे, जहां पूर्वजों के लिए विभिन्न प्रकार के व्यंजन निकालकर अर्पित किए गए। ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद परिवार के सदस्यों ने प्रसाद ग्रहण किया।

परंपरा के अनुसार, शाम को घर के मुख्य द्वार पर दीप प्रज्वलित कर पितरों को विदाई देने की भी तैयारी की गई। इस अवसर पर बांस की कनई में अनाज की छोटी-छोटी पोटलियां बांधकर पितरों से अपने लोक लौटने का अनुरोध करने की मान्यता भी प्रचलित है।

पितृ पक्ष में पूर्वजों के स्मरण का विशेष महत्व

सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज अपने वंशजों के आसपास रहते हैं और श्राद्ध, तर्पण एवं अन्य धार्मिक कर्मों से संतुष्ट होकर आश्विन अमावस्या पर अपने लोक लौट जाते हैं। धार्मिक परंपरा में पितरों के प्रति श्रद्धा और उनके निमित्त श्राद्ध कर्म को पारिवारिक दायित्व तथा पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम माना गया है।

तीन पीढ़ियों की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध का विधान

ज्योतिषविद एवं कर्मकांडी आचार्य उदय तिवारी तथा पिशाचमोचन तीर्थ कुंड के शेर वाले घाट के कर्मकांडी आचार्य प्रदीप पांडेय और अवधेश पाठक ने ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से बातचीत में कहा कि भारत की पारिवारिक एवं सामाजिक परंपरा में संबंधों को विशेष महत्व दिया गया है। यहां व्यक्ति जीवनकाल में ही नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद भी अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन करता है।

उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में पितरों का स्मरण कर उनसे मार्गदर्शन लेने की परंपरा रही है। हालांकि, समय के साथ इस विद्या की साधना और परंपराओं का पालन कम होने से आधुनिक समाज में पितरों के अस्तित्व और उनसे जुड़े विश्वासों के प्रति उदासीनता बढ़ी है। इसके बावजूद अनेक लोग श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के माध्यम से अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

आचार्यों के अनुसार, पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए जीवन में कम से कम तीन बार त्रिपिंडी श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। इसमें तीन पीढ़ियों के पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तर्पण और श्राद्ध कर्म से पितृदोष की शांति तथा पूर्वजों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन होता है। पितृ पक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा-अर्चना करने से उनकी आत्मा की शांति की कामना की जाती है।----------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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