मुख्यमंत्री योगी से मिलेंगे कालीन-दरी सेक्टर के प्रतिनिधि ऋषभ जैन, साझा करेंगे करघों की खामोशी का दर्द
- पेट की मजबूरी ने छीनी पीढ़ियों पुरानी कला, बुनकरों के पलायन से इंडस्ट्री पर गहराया संकट
- कालीन इंडस्ट्री के गिरते हालात को प्रमुखता से उठाएंगे, कारीगरों की बदहाली पर खीचेंगे ध्यान
मीरजापुर, 19 अप्रैल (हि.स.)। विंध्य क्षेत्र के गांवों में अब करघों की आवाज पहले जैसी नहीं रही। जिन घरों में कभी दिन-रात कालीन बुनाई होती थी, वहां आज सन्नाटा है। कारीगर मजदूरी या दूसरे काम की तलाश में पलायन कर रहे हैं। क्या विश्वप्रसिद्ध कालीन इंडस्ट्री सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ रही है? क्या बुनकरों का पलायन और इंडस्ट्री का डाउनफॉल सिस्टम की विफलता का नतीजा है? इन सवालों के साथ उत्तर प्रदेश निर्यात संवर्धन परिषद में कालीन एवं दरी सेक्टर के प्रतिनिधि, विक्रम कार्पेट्स के सीईओ और हथकरघा हस्तशिल्प निर्यातक कल्याण संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अटल सम्मान 2024 से सम्मानित ऋषभ कुमार जैन जल्द ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से संवाद करेंगे।
ऋषभ जैन की मुख्यमंत्री से यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है, जब कालीन इंडस्ट्री लगातार गिरावट और कारीगरों के पलायन से जूझ रही है। 'हिन्दुस्थान समाचार' से खास बातचीत में ऋषभ कुमार जैन ने कहा कि चुनावी माहौल यानी 4 मई के बाद मीरजापुर-भदोही की कालीन इंडस्ट्री और बुनकरों, कारीगरों की समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री से मुलाकात करेंगे। इस अहम मुलाकात में कालीन इंडस्ट्री के लगातार गिरते हालात को प्रमुखता से उठाया जाएगा। खासतौर पर बुनकरों, मजदूरों और छोटे कारीगरों की आर्थिक बदहाली पर सरकार का ध्यान खींचा जाएगा। ऋषभ जैन ने कहा कि भारतीय कारीगरी को दुनिया में सबसे ऊंचा स्थान दिलाना हमारा लक्ष्य है। जब कारीगर ही इंडस्ट्री छोड़ रहे हैं तो यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा? पारंपरिक कला को बचाने के लिए दीर्घकालिक नीति का भी अभाव है। सरकार से उनकी मांग है कि फाइनेंशियल सपोर्ट सिर्फ एक्सपोर्टर्स तक सीमित न रहे। बुनकरों और श्रमिकों का व्यापक रजिस्ट्रेशन कर डेटा बेस तैयार किया जाए। सीधे कारीगरों तक फाइनेंशियल सपोर्ट दी जाए। इंडस्ट्री को ऑर्गेनाइज्ड ढांचे में लाकर सीधी सहायता और पलायन रोकने के लिए विशेष पैकेज दी जाए।
पीढ़ियों की पहचान गढ़ते हैं करघे, इतिहास न बन जाए विरासत
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कालीन इंडस्ट्री को संगठित करने और कारीगरों का रजिस्ट्रेशन करने में न तो विभाग सक्रिय दिख रहा है और न ही कोई ठोस पहल जमीन पर नजर आ रही है। नतीजा यह है कि कारीगर मजबूर होकर दूसरे कामों की ओर जा रहे हैं। स्थानीय बुनकर बताते हैं कि मेहनत तो पहले जितनी ही है, लेकिन आमदनी लगातार घटती जा रही है। कई परिवारों ने करघे समेट दिए हैं। नई पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही है। अब इस काम में पेट नहीं चलता, इसलिए बच्चे को कहीं और भेजना पड़ रहा है। जो कला विंध्य क्षेत्र की पहचान थी, वही अब लोगों के लिए बोझ बनती जा रही है। सरकारी योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच रहा है। करघे सिर्फ धागे नहीं बुनते, बल्कि पीढ़ियों की पहचान बुनते हैं। अगर ये खामोश हुए तो सिर्फ एक इंडस्ट्री नहीं, एक विरासत खत्म हो जाएगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / गिरजा शंकर मिश्रा

