महंत अवेद्यनाथ व महंत दिग्विजयनाथ का जीवन निष्काम कर्मयोग की जीवंत मिसाल : प्रो. द्वारका नाथ

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महंत अवेद्यनाथ व महंत दिग्विजयनाथ का जीवन निष्काम कर्मयोग की जीवंत मिसाल : प्रो. द्वारका नाथ


महंत अवेद्यनाथ व महंत दिग्विजयनाथ का जीवन निष्काम कर्मयोग की जीवंत मिसाल : प्रो. द्वारका नाथ


गोरखपुर, 19 अगस्त (हि.स.)। महाराणा प्रताप महाविद्यालय जंगल धूसड़, गोरखपुर में राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि की स्मृति में आयोजित सप्तदिवसीय व्याख्यानमाला के दूसरे दिन बुधवार काे ‘भगवद्गीता का जीवन दर्शन : निष्काम कर्मयोग’ विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. द्वारका नाथ रहे।

मुख्य वक्ता प्रो. द्वारका नाथ ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति-विज्ञान और जीवन-दर्शन का ऐसा अद्वितीय ग्रंथ है, जिसमें मानव जीवन की समस्याओं का केवल सैद्धांतिक विवेचन ही नहीं, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान का मार्ग भी प्रस्तुत किया गया है। गीता मनुष्य को कर्म से पलायन नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य को निष्ठा, विवेक और समर्पण के साथ करने की प्रेरणा देती है। उन्होंने राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज और युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के जीवन को निष्काम कर्मयोग की जीवंत अभिव्यक्ति बताते हुए कहा कि दोनों महापुरुषों ने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र, संस्कृति और धर्म के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि जब कर्म व्यक्तिगत लाभ की आकांक्षा से मुक्त होकर लोकमंगल की भावना से किया जाता है, तब वही कर्म साधना का रूप ले लेता है।

प्रो. द्वारका नाथ ने गीता में वर्णित कर्म के पांच प्रमुख तत्वों अधिष्ठान अर्थात शरीर, कर्ता, करण अर्थात इंद्रियां एवं साधन, विभिन्न प्रकार की चेष्टाएं तथा दैव की विस्तार से व्याख्या की। कहा कि किसी भी कर्म की पूर्णता के पीछे केवल व्यक्ति की इच्छा ही नहीं, बल्कि शरीर, साधन, प्रयास और परिस्थितियों सहित अनेक तत्व कार्य करते हैं। इस तथ्य को समझने से व्यक्ति में अहंकार कम होता है और कर्म के प्रति अधिक संतुलित एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होता है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि निष्काम कर्मयोग का वास्तविक अर्थ कर्म के फल को नकारना नहीं, बल्कि फल के प्रति आसक्ति को त्यागकर कर्म की श्रेष्ठता पर ध्यान देना है। विद्यार्थी यदि अपने अध्ययन को केवल परीक्षा और अंक प्राप्त करने का माध्यम न मानकर ज्ञानार्जन और आत्मविकास का साधन मानें, तो शिक्षा अधिक सार्थक बनेगी।

कर्म में निष्ठा और परिणाम में समत्व ही गीता के जीवन-दर्शन का सार

समारोह की अध्यक्षता करते हुए रसायन शास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. शिवकुमार बर्नवाल ने कहा कि भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग व्यक्ति को कर्म, ज्ञान और आत्मानुशासन के माध्यम से श्रेष्ठ जीवन की ओर ले जाता है। गीता का संदेश केवल किसी एक काल, वर्ग या व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए सार्वकालिक है। उन्होंने कहा कि कर्म में निष्ठा और परिणाम में समत्व ही गीता के जीवन-दर्शन का सार है। कार्यक्रम का संचालन रक्षा अध्ययन विभाग के प्रभारी विवेक विश्वकर्मा ने किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के समस्त शिक्षक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

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