कानपुर में परेड की रामलीला में डेढ़ सौ साल बाद आज भी जीवंत है आस्था, दशहरे पर 90 फीट के रावण का होगा दहन
कानपुर, 19 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जनपद कानपुर में ब्रिटिश काल से चली आ रही परेड की ऐतिहासिक रामलीला ने 150 वर्षों का सफर पूरा कर लिया है। डेढ़ सदी से चली आ रही यह परंपरा आज भी शहर की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है। दशहरे पर रामलीला मैदान में 90 फीट ऊंचे रावण का पुतले दहन होगा। इसके लिए तैयारियां अंतिम चरण में हैं और पुतले को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
परेड रामलीला सोसाइटी के महामंत्री आलोक अग्रवाल ने सोमवार को बताया कि साल 1877 में शुरू हुई परेड की रामलीला कानपुर की पहचान का अहम हिस्सा बन चुकी है। हर साल दशहरे पर यहां बड़ी संख्या में लोग रामलीला देखने और रावण दहन के साक्षी बनने पहुंचते हैं। इस आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ वर्षों पुरानी परंपराओं की झलक भी देखने को मिलती है।
परेड की रामलीला में पिछले 40 वर्षों से मथुरा का चतुर्वेदी परिवार विभिन्न पात्रों का मंचन करता आ रहा है। रामलीला के दौरान व्यास महेश दत्त चतुर्वेदी चौपाइयों और दोहों का गायन करते हैं। पारंपरिक शैली में होने वाला मंचन रामकथा को जीवंत बनाता है और दर्शकों को उससे जोड़ता है।
दशहरे पर रावण दहन के दौरान मैदान में जय श्रीराम के जयकारे गूंजेंगे। इस बार 90 फीट ऊंचे रावण के पुतले को विशेष रूप दिया जा रहा है। पुतले में ठहाकों, आंखों से निकलने वाली लेजर लाइट और मुंह से निकलने वाले अंगारों की व्यवस्था की गई है, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बनेगी।
परेड रामलीला में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने की जिम्मेदारी सलीम खान और उनका परिवार कई वर्षों से निभाता आ रहा है। धार्मिक आयोजन से जुड़ी इस परंपरा में परिवार की भागीदारी आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द की मिसाल भी पेश करती है। परेड की रामलीला इस तरह 150 वर्षों की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के साथ एकता और इंसानियत का संदेश भी देती है।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

