भरत चरित्र के आदर्शों से मिलता है प्रेरक संदेश : कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज

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भरत चरित्र के आदर्शों से मिलता है प्रेरक संदेश : कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज


भरत चरित्र के आदर्शों से मिलता है प्रेरक संदेश : कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज


भरत चरित्र के आदर्शों से मिलता है प्रेरक संदेश : कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज


भरत चरित्र के आदर्शों से मिलता है प्रेरक संदेश : कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज


गोरखपुर, 28 जुलाई (हि.स.)। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री गोरखनाथ मंदिर गोरखपुर में आयोजित सप्तदिवसीय श्रीराम कथा के छठे दिन मंगलवार काे कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने श्रीरामचरितमानस के भरत चरित्र का अत्यंत भावपूर्ण एवं प्रेरणादायी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भरत जी कोई सामान्य व्यक्तित्व नहीं हैं। उनका चरित्र उस पवित्र तीर्थजल के समान है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य पवित्र होता है। उसी प्रकार भरत चरित्र का श्रवण करने से जीवन पावन हो जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर के दोषों और दुर्गुणों का त्याग करना चाहिए। बाहरी शत्रु को कभी-कभी क्षमा किया जा सकता है, किंतु घर के भीतर प्रवेश कर चुके शत्रु को नहीं, क्योंकि वह भीतर ही भीतर पूरे परिवार को खोखला कर देता है।

उन्होंने कहा कि पिता के निधन से बड़ा दुःख कोई नहीं होता। महर्षि वशिष्ठ ने भरत जी को समझाते हुए कहा था कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश सब विधि के हाथ हैं। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में धैर्य और समभाव बनाए रखना चाहिए। जिनका जीवन यशस्वी एवं प्रतापी रहा हो, उनके निधन पर विलाप नहीं, बल्कि उनके आदर्शों का अनुसरण करना चाहिए।

आचार्य जी ने कहा कि अच्छा वक्ता बनने से पहले अच्छा श्रोता बनना आवश्यक है। जो धैर्यपूर्वक सुनता है, वही उचित और सार्थक उत्तर दे सकता है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की महत्ता बताते हुए कहा कि संसार के अनेक देशों में राज्य प्राप्त करने के लिए पिता, भाई अथवा परिजनों की हत्या तक कर दी जाती है, जबकि हमारी संस्कृति में भरत जी को राज्य मिलने पर भी उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। भरत त्याग की प्रतिमूर्ति और सच्चे संत हैं। संत वही है, जो जीव का प्रभु से मिलन करा दे। इसी भावना से भरत जी समस्त अयोध्यावासियों को लेकर चित्रकूट भगवान श्रीराम के दर्शन हेतु गए।

उन्होंने कहा कि भरत जी के हृदय में केवल एक ही अभिलाषा थी कि श्रीसीताराम के चरणों में उनका प्रेम निरंतर बढ़ता रहे। उन्हें धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष की नहीं, केवल श्रीसीताराम की प्राप्ति की कामना थी। आचार्य शांतनु जी ने कहा कि श्रीराम का चरित्र स्वयं एक महाकाव्य है। जो भी श्रद्धापूर्वक उसका श्रवण करता है, उसके भीतर सृजन, संवेदना और सदाचार का भाव जागृत होता है। श्रीराम और भरत का मिलन प्रेम, त्याग और समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है कि यदि भरत जी का जन्म न हुआ होता तो संसार भरत जैसे आदर्श चरित्र को कैसे जान पाता?

उन्होंने कहा कि संसार के अधिकांश भाई संपत्ति बाँटते हैं, किंतु भरत जैसे भाई विपत्ति बाँटते हैं। भरत जी ने श्रीराम से आग्रह किया था कि यदि पिता की आज्ञा का पालन करना ही है तो वे स्वयं वन में रहेंगे और श्रीराम अयोध्या लौटकर राज्य संभालें। आचार्य जी ने वर्तमान समय की धार्मिक प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज धार्मिक अनुष्ठान केवल औपचारिकता बनते जा रहे हैं। लोग अखंड रामायण पाठ तो कराते हैं, किंतु स्वयं एक पंक्ति भी नहीं पढ़ते। वे केवल स्वागत-सत्कार और व्यवस्थाओं में व्यस्त रहते हैं, जबकि धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य स्वयं के जीवन में परिवर्तन लाना है। यदि रामायण का आयोजन हो तो उस भाई को भी आमंत्रित करें जिससे वर्षों से बातचीत बंद हो; तभी ऐसे आयोजन की वास्तविक सार्थकता सिद्ध होगी।

उन्होंने बताया कि भरत जी श्रीराम की चरणपादुकाएँ अयोध्या लाकर राजसिंहासन पर विराजमान करते हैं और स्वयं नंदीग्राम में कुटिया बनाकर अत्यंत तपस्वी जीवन व्यतीत करते हैं। उनके त्याग, नियम और तपस्या को देखकर ऋषि-मुनि भी श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं। आचार्य जी ने कहा कि हम सनातन धर्मावलंबी अत्यंत भाग्यशाली हैं, क्योंकि हमारी संस्कृति जीवन-मूल्यों, संतों, मंदिरों तथा पर्व-त्योहारों के साथ जीना सिखाती है। यहाँ मृत्यु को भी उत्सव के रूप में स्वीकार करने की परंपरा है। उन्होंने भारतवर्ष की महिमा का वर्णन करते हुए गीत जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वह भारत देश है मेरा प्रस्तुत कर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

उन्होंने कहा कि ब्रह्म परीक्षा का नहीं, जिज्ञासा का विषय है। जिन्होंने भी ब्रह्म की परीक्षा लेने का प्रयास किया, चाहे इंद्र, ब्रह्मा, सती अथवा इंद्रपुत्र जयंत हों, उन्हें अंततः अपमान का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि सुखी दांपत्य जीवन में विघ्न उत्पन्न करने वाले लोग भी जयंत रूपी कौओं के समान होते हैं। आज परिवारों में बहू-बेटे के बीच मतभेद होने पर अनेक माताएँ बिना विचार किए पुत्र का पक्ष लेकर बहू का विरोध करने लगती हैं, जिससे परिवार टूटने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

कथा का समापन आरती और प्रसाद वितरण से हुआ। संचालन डॉ अरविंद कुमार चतुर्वेदी ने किया। इस अवसर पर योगी कमल नाथ जी महाराज, महंत रविंद्रदास जी महाराज, बालकदास जी, व्यापारी कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष पुष्पदंत जैन, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष कामेश्वर सिंह, रामजन्म सिंह, डॉ प्रदीप राव, यजमान बैजनाथ जायसवाल, आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

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