पत्रकारिता का ‘कल्पवृक्ष’ बना ‘कल्याण’, 9 अगस्त को पूरे हो रही प्राकट्य की शताब्दी

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पत्रकारिता का ‘कल्पवृक्ष’ बना ‘कल्याण’, 9 अगस्त को पूरे हो रही प्राकट्य की शताब्दी


-गीताप्रेस की विश्वप्रसिद्ध धार्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ ने पूरे किए 100 वर्ष

-भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार की साधना और सनातन चिंतन की अमूल्य विरासत का स्मरण

-गीता वाटिका में शताब्दी दिवस पर होगा भगवन्नाम संकीर्तन, प्रथम अंक के चयनित पदों का गायन और पूजन-अर्चन

गोरखपुर, 08 अगस्त (हि.स.)। सनातन धर्म, अध्यात्म और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में शताब्दी से निरंतर अपनी विशिष्ट भूमिका निभा रही विश्वप्रसिद्ध धार्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ के प्रकाशन के 100 वर्ष रविवार, 9 अगस्त 2026 को पूरे हो रहे हैं। श्रावण कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत 2083 का यह दिन ‘कल्याण’ के प्राकट्य की शताब्दी का साक्षी बनेगा। इस ऐतिहासिक अवसर पर गोरखपुर स्थित गीता वाटिका में विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन होंगे।

‘कल्याण’ का प्रथम अंक आज से ठीक एक शताब्दी पूर्व बंबई के वेंकटेश्वर प्रेस में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद दूसरे वर्ष के दूसरे अंक से इसका मुद्रण गोरखपुर स्थित गीताप्रेस में प्रारंभ हुआ और देखते ही देखते ‘कल्याण’ भारतीय धार्मिक पत्रकारिता की ऐसी कालजयी धरोहर बन गई, जिसने देश-विदेश में सनातन संस्कृति, धर्म, अध्यात्म, सदाचार और भगवद्भक्ति के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार की तपस्या से मिला ‘कल्याण’ को स्वरूप

‘कल्याण’ के आदि संपादक नित्यलीलालीन गृहस्थ संत भाईजी श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार थे। उन्होंने इसके प्रथम अंक में ‘कल्याण की आवश्यकता’ शीर्षक से संपादकीय लिखकर पत्रिका के उद्देश्य और उसकी मूल भावना को स्पष्ट किया था। भाईजी ने अपने अत्यंत विनम्र और आध्यात्मिक चिंतन से परिपूर्ण संपादकीय में कहा था कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने कल्याण की कामना करता है, लेकिन वास्तविक कल्याण का स्वरूप अलग-अलग लोगों के लिए अलग हो सकता है।

भाईजी के अनुसार ऋषि-मुनियों, संतों और महापुरुषों ने परमात्मा की प्राप्ति को ही मनुष्य का परम कल्याण माना है। यही मोक्ष है, यही भगवान के प्रति अनन्य प्रेम है और यही मनुष्य जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ है। उनके चिंतन में परम कल्याण किसी जाति, वर्ण, लिंग, धन, विद्या अथवा सामाजिक स्थिति पर निर्भर नहीं, बल्कि परमात्मा की शरणागति और निष्कपट भक्ति पर आधारित है।

‘कल्याण’ का उद्देश्य केवल प्रकाशन नहीं, जीवन का परिष्कार

भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार ने ‘कल्याण’ के माध्यम से प्राचीन ऋषि-मुनियों, संतों और महापुरुषों की दिव्य वाणी को जनसामान्य तक पहुंचाने का संकल्प लिया था। उनका मानना था कि महापुरुषों के विचार और वचन पथभ्रष्ट मनुष्य को जीवन के कल्याणकारी मार्ग पर ले जाने में समर्थ हैं।

‘कल्याण’ के प्रथम संपादकीय में उन्होंने अपनी योग्यता और सामर्थ्य को लेकर भी अत्यंत विनम्र भाव व्यक्त किया था। उन्होंने स्वयं को ‘कल्याण’ के कार्य के योग्य न मानते हुए इसे परमात्मा की कृपा और महापुरुषों के आशीर्वाद से संभव होने वाला कार्य बताया था। यही विनम्रता आगे चलकर ‘कल्याण’ की संपादकीय परंपरा की पहचान बनी।

शताब्दी दिवस पर गीता वाटिका में विशेष आयोजन

‘कल्याण’ के प्राकट्य की शताब्दी के पावन अवसर पर 9 अगस्त 2026, रविवार को प्रातः सात बजे से गीता वाटिका स्थित भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार की तपस्यास्थली एवं पावन कक्ष में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस अवसर पर ‘कल्याण’ के प्रथम अंक से चयनित अनेक पदों का गायन, भगवन्नाम संकीर्तन तथा भाईजी और ‘कल्याण’ ग्रंथ का विधिवत पूजन-अर्चन किया जाएगा। आयोजन में ‘कल्याण’ की शताब्दी यात्रा, उसके आध्यात्मिक उद्देश्य और भाईजी की साधना एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक सेवाओं का स्मरण किया जाएगा।

सौ वर्ष बाद भी प्रासंगिक है ‘कल्याण’ का संदेश

‘कल्याण’ की शताब्दी केवल किसी धार्मिक पत्रिका के प्रकाशन के सौ वर्ष पूरे होने का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक पत्रकारिता की एक गौरवपूर्ण यात्रा का उत्सव है। एक शताब्दी से ‘कल्याण’ ने धर्म, अध्यात्म, भक्ति, सदाचार, संस्कार और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को सरल एवं प्रमाणिक रूप में समाज तक पहुंचाने का कार्य किया है। भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार की मूल भावना—सभी प्राणियों के परम कल्याण की कामना—आज भी ‘कल्याण’ की आत्मा बनी हुई है। इसी भावना के साथ इसकी शताब्दी का पावन अवसर गोरखपुर में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना के वातावरण में मनाया जाएगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

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