मानस ही भवसागर से पार होने की नौका : प्रज्ञा भारती गिरी
फर्रुखाबाद, 04 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जनपद फर्रुखाबाद में श्री पाण्डेश्वर नाथ मंदिर (पण्डा बाग) सत्संग भवन में चल रहे 38वें मानस सम्मेलन में रविवार काे कथा वाचक साध्वी प्रज्ञा भारती गिरी 'पंछी देवी' (हरिद्वार) ने अपने विचार व्यक्त किये। उन्हाेंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने सम्पूर्ण वाङ्मय को मानस में समाहित कर दिया है। यह मानस ही संसार रूपी भवसागर से पार होने की नौका है। मानव का चिन्तन, परमार्थ का ज्ञान, जीवन के विचार और शास्त्र के विचार का समीचीन चिन्तन तुलसीदास जी ने श्रीराम की कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
'पंछी देवी' ने कहा कि श्रीराम ने लंका विजय से पूर्व अपने पावन चरित्र की गरिमा स्थापित की। मानस की कथा मानव जीवन के मुक्ति की गाथा है। उन्होंने मर्यादा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो आज भी प्रासंगिक है। भक्ति और सेवा ही धर्म का वास्तविक आचरण है, जो नर को पूज्य और नारायण रूप बनाता है। आज शास्त्रों के अनुसार आचरण करने की महती आवश्यकता है। सारे सत्संग से श्रीराम के दर्शन होते हैं। दर्श और आदर्श आचरण ही परमात्मा के दर्शन कराते है
कथा व्याख्याकारों ने कहा कि मूल मंत्र संतों के सत्संग में ही मिलता है।
पं. पीलाराम जी ने कहा कि गीता, रामायण, भागवत के शास्त्र चिन्तन से ही मानव जीवन कल्याणमय होता है। संकट और विषम परिस्थितियों में शास्त्र का चिन्तन ही मार्गदर्शन करता है। मानस ग्रन्थ अग्रदूत ग्रन्थ है जो समय-समय पर मार्ग प्रशस्त करता है। लीला भारती (दतिया, म.प्र.)
मानस विदुषी लीला भारती ने भरत चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने दैनिक घटनाओं के माध्यम से मार्गदर्शन किया है। श्री हनुमान जी का चरित्र त्याग-तपस्या की पराकाष्ठा है तो भरत भैया प्रेम की मूर्ति हैं।
कार्यक्रम का संचालन बृजकिशोर सिंह 'किशोर' एवं विशेष पाठक ने किया।
हिन्दुस्थान समाचार / चंद्रपाल सिंह सेंगर

