कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए नीतियों, पद्धतियों और साझेदारियों में समन्वय आवश्यक : प्रो. अशोक गुलाटी
कानपुर, 12 जनवरी (हि.स.)। भारतीय कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि नीतियों, उत्पादों, कृषि पद्धतियों और साझेदारियों के बीच मजबूत तालमेल आवश्यक है। इसके साथ ही, किसानों की शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल विकास में निवेश करना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह बातें सोमवार को भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (आईसीआरआईईआर) के प्रो. अशोक गुलाटी ने कही।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी द्वारा स्वस्तिभवतु व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत सतत कृषि और खाद्य सुरक्षा पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। अपने संबोधन में प्रो. गुलाटी ने भारत द्वारा खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में की गई उल्लेखनीय प्रगति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस सफलता के साथ-साथ मिट्टी, जल, वायु और जैव विविधता जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव एक गंभीर चुनौती बन गया है। उन्होंने सतत और संतुलित कृषि नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया, जो उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी सुनिश्चित करे।
उन्होंने सटीक कृषि (प्रिसिजन एग्रीकल्चर) से जुड़ी आधुनिक तकनीकों—जैसे सेंसर, स्मार्ट कैमरे, ड्रोन और ‘सी एंड स्प्रे’ जैसी प्रणालियों—की भूमिका को रेखांकित किया, जो आवश्यकता के अनुसार कृषि इनपुट के उपयोग में मदद करती है। प्रो. गुलाटी ने कहा कि आईआईटी जैसे संस्थानों को किसानों के लिए किफायती और व्यावहारिक तकनीकी समाधान विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभानी होगी।
आगे कहा, अभारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए चार प्रमुख स्तंभों—नीतियों, उत्पादों, पद्धतियों और साझेदारियों—का समन्वय आवश्यक है। आईआईटी जैसे शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका ऐसी तकनीकों के विकास में बेहद अहम है, जो किसानों को कम संसाधनों में अधिक और टिकाऊ उत्पादन करने में सक्षम बनाएं। सतत कृषि केवल सामूहिक और समन्वित प्रयासों से ही संभव है।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

