पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों के सीखने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम : भगवती सिंह

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पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों के सीखने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम : भगवती सिंह


स्व-अध्ययन आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल, माध्यमिक शिक्षा परिषद और यूनिसेफ की दो दिवसीय कार्यशाला संपन्न

प्रयागराज, 26 मई (हि.स.)। पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों के सीखने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होती हैं। इसलिए उनका छात्र-केंद्रित, सरल, रोचक और प्रभावी होना अत्यंत आवश्यक है। उक्त बातें मंगलवार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए उपयोगी पहल कार्यक्रम में सचिव भगवती सिंह ने कहीं।

उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और नवाचार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि कार्यशाला में प्राप्त सुझावों के आधार पर तैयार होने वाली अध्ययन सामग्री विद्यार्थियों के लिए अधिक उपयोगी और स्व-अध्ययन को प्रोत्साहित करने वाली होगी।

माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश और यूनिसेफ इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में 25 एवं 26 मई को आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का सफल समापन हुआ। कार्यशाला का उद्देश्य कक्षा 9 एवं 10 के विद्यार्थियों के लिए विकसित किए जा रहे स्व-अध्ययन मॉड्यूल की गुणवत्ता को और बेहतर बनाना तथा उसे अधिक छात्र-केंद्रित एवं प्रभावी बनाना था।

कार्यशाला में माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश के शोध एवं सांख्यिकी सहायक, विभिन्न विद्यालयों के शिक्षक तथा पंचायत शिक्षा संस्थान के विषय विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस दौरान प्रतिभागियों को स्व-अध्ययन सामग्री के विकास, समीक्षा और उसमें आवश्यक सुधार की प्रक्रियाओं से अवगत कराया गया।

कार्यशाला की मुख्य अतिथि परिषद की सचिव भगवती सिंह रहे, जबकि पंचायत शिक्षा संस्थान के अपर शिक्षा निदेशक एन. एल. चौरसिया ने दोनों दिनों तक प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। उद्घाटन सत्र में परिषद की उप सचिव रेखा श्रीवास्तव ने कार्यशाला के उद्देश्यों और महत्व पर प्रकाश डाला।

छात्र-केंद्रित शिक्षा पर रहा विशेष जोर

कार्यशाला में यूनिसेफ द्वारा तैयार किए गए एक विशेष फ्रेमवर्क के आधार पर पाठ्यपुस्तकों और स्व-अध्ययन सामग्री की समीक्षा की गई। प्रतिभागियों ने समूहों में कार्य करते हुए पाठ्य सामग्री की उपयोगिता, विद्यार्थियों की समझ, विषयवस्तु की प्रस्तुति और सीखने की प्रभावशीलता जैसे विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया।

पहले दिन प्रतिभागियों को विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा के व्यावहारिक तरीके सिखाए गए, जबकि दूसरे दिन सुझावों के आधार पर संशोधित सामग्री का प्रस्तुतीकरण किया गया। इस प्रक्रिया ने शिक्षकों और विशेषज्ञों को विद्यार्थियों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझने का अवसर प्रदान किया।

कार्यशाला का समापन यूनिसेफ इंडिया की कार्यक्रम निदेशक मोनिका डेहन हेनरिक्स के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम में परिषद के उपसचिव, शिक्षा विभाग के अधिकारी, यूनिसेफ के प्रतिनिधि तथा अन्य विशेषज्ञ भी उपस्थित रहे।

शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने इस पहल को नई शिक्षा पद्धतियों को बढ़ावा देने और विद्यार्थियों में स्व-अध्ययन की संस्कृति विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

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हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल

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