वाराणसी की लोक प्रचलित अक्षरांकन परंपरा पर शोध पत्र प्रस्तुत

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वाराणसी की लोक प्रचलित अक्षरांकन परंपरा पर शोध पत्र प्रस्तुत


वाराणसी, 29 सितंबर (हि.स.)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के दृश्य कला संकाय के एप्लाइड आर्ट्स विभाग के प्रो. मनीष अरोड़ा और सीएसजेएम विश्वविद्यालय, कानपुर के ललित कला विभाग की सहायक प्राध्यापक तनिशा वाधवन ने वाराणसी की लोक प्रचलित अक्षरांकन परंपरा पर शोध किया है।

“फ्रॉम काशी स्ट्रीट्स टू डिजिटल टाइप: अ प्रैक्टिस-लेड स्टडी ऑफ वर्नैक्युलर एंड मल्टीलिंगुअल लेटरिंग इन वाराणसी” शीर्षक से तैयार इस शोध पत्र को टाइपोग्राफी डे 2026 के अवसर पर अंतरविषयी सुलेखकार एवं शोधकर्ता अभिषेक वर्धन ने प्रस्तुत किया।

प्रो. मनीष अरोड़ा के अनुसार, शोध का उद्देश्य वाराणसी में प्रचलित हाथ से लिखे गए और बहुभाषी अक्षरांकन को स्थानीय दृश्य संस्कृति तथा टाइपोग्राफिक ज्ञान के महत्वपूर्ण स्वरूप के रूप में समझना है। अध्ययन में देवनागरी अक्षररूपों के साथ-साथ अक्षरांकन में प्रयुक्त सामग्री और सतह, दृश्य संरचना, शहरी परिवेश तथा पारंपरिक अक्षरांकन से डिजिटल डिजाइन की ओर होने वाले रूपांतरण का विश्लेषण किया गया है।

शोध के दौरान दृश्य प्रलेखन, विश्लेषण, हस्तनिर्मित पुनर्रचना, दृश्य अमूर्तन और डिजिटल प्रयोग जैसी प्रक्रियाओं का उपयोग किया गया। इन माध्यमों के जरिए वाराणसी की जीवंत और लोक आधारित अक्षरांकन परंपरा को समकालीन टाइपोग्राफी एवं डिजाइन के विमर्श से जोड़ने का प्रयास किया गया है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि वाराणसी की गलियों, दुकानों, दीवारों और विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर दिखाई देने वाले हाथ से निर्मित अक्षर केवल सूचना देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे शहर की दृश्य संस्कृति, स्थानीय सौंदर्यबोध और बहुभाषी सामाजिक परिवेश को भी अभिव्यक्त करते हैं। अध्ययन इसी लोक दृश्य विरासत को समझने और समकालीन डिजिटल टाइप डिजाइन के संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने की संभावनाओं को रेखांकित करता है।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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