ऑटिज्म बच्चों के लिए समझ और व्यवहारिक सहयोग जरूरी : रूमा चतुर्वेदी
कानपुर, 04 अप्रैल (हि.स.)। ऑटिज्म से जुड़े बच्चों की चुनौतियों को समझना और उनके अनुसार व्यवहार करना समाज की जिम्मेदारी है। ऐसे बच्चों के साथ सामान्य व्यवहार के साथ उनकी विशेष जरूरतों को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि सही मार्गदर्शन और सहयोग से उनके विकास में सकारात्मक बदलाव संभव है। अभिभावकों को धैर्य और समझ के साथ बच्चों का साथ देना चाहिए, ताकि वे समाज में बेहतर ढंग से खुद को स्थापित कर सकें। ऑटिज्म को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करना भी उतना ही जरूरी है। यह बातें शनिवार को विषय प्रवर्तक रूमा चतुर्वेदी ने कहीं।
विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर दयानन्द वीमेंस ट्रेनिंग कॉलेज, मकराबर्टगंज में कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि राधिका स्वरूप और मुख्य वक्ता डॉ. आलोक बाजपेयी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अंकुर सिंह ने किया।
इस दौरान पुष्पा खन्ना मेमोरियल सेंटर के बच्चों ने नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत कर ऑटिज्म के प्रति जागरूकता का संदेश दिया, जिसे उपस्थित लोगों ने सराहा।
मुख्य वक्ता डॉ. आलोक बाजपेयी ने कहा कि ऑटिज्म एक न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें बच्चों के संचार, व्यवहार और सामाजिक संपर्क के तरीके अलग होते हैं। उन्होंने बताया कि समय पर पहचान और सही प्रशिक्षण से ऐसे बच्चों के विकास में सुधार संभव है।
ऑटिज्म एक ऐसी अवस्था है, जिसमें बच्चा सामान्य बच्चों की तुलना में अलग तरीके से सोचता और प्रतिक्रिया देता है। इसमें भाषा विकास में देरी, आंखों से संपर्क कम करना और एक ही व्यवहार को बार-बार दोहराना जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं।
प्रधानाचार्य प्रो. रत्ना गुप्ता ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज में जागरूकता बढ़ाने और अभिभावकों को सही दिशा देने में सहायक होते हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

