डीआईसी की समय पर पहचान से मातृ मृत्यु दर घटाई जा सकती है : डॉ. सीमा द्विवेदी
कानपुर, 04 जून (हि.स.)। डीआईसी जैसी गंभीर गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं की समय पर पहचान और उपचार से मातृ मृत्यु दर में प्रभावी कमी लाई जा सकती है। अनियमित जीवनशैली, असंतुलित खानपान, मानसिक तनाव, प्रदूषण और कीटनाशकों का बढ़ता प्रभाव महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, जिससे गर्भावस्था के दौरान गंभीर जोखिम बढ़ रहे हैं। यह बातें शनिवार को जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रोफेसर एवं वरिष्ठ कंसल्टेंट डॉ. सीमा द्विवेदी ने कहीं।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के जच्चा-बच्चा विभाग में आज मातृ मृत्यु दर कम करने और गर्भवती महिलाओं में होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों ने डीआईसी (डिसेमिनेटेड इंट्रावास्कुलर कोएगुलेशन) समेत गर्भावस्था से जुड़ी गंभीर जटिलताओं की रोकथाम, समय पर पहचान और उपचार पर विस्तार से चर्चा की।
डॉ. सीमा द्विवेदी ने बताया कि डीआईसी ऐसी गंभीर चिकित्सीय स्थिति है, जिसमें शरीर के भीतर अनियंत्रित रूप से रक्त के थक्के बनने लगते हैं। इससे शरीर के विभिन्न अंगों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है और बाद में अत्यधिक रक्तस्राव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने कहा कि यह मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, प्री-एक्लेम्पसिया और अन्य गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं का समय पर उपचार नहीं होने पर मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एस.के. गौतम ने कहा कि मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए गर्भवती महिलाओं की नियमित प्रसव पूर्व जांच, जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की समय पर पहचान और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को हाई-रिस्क गर्भावस्था के मामलों में विशेष सतर्कता के साथ कार्य करना चाहिए, ताकि जटिलताओं को शुरुआती चरण में ही नियंत्रित किया जा सके।
प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. नीना गुप्ता ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर, प्री-एक्लेम्पसिया, अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण जैसी समस्याओं को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि समय पर जांच, संतुलित आहार, नियमित चिकित्सकीय परामर्श और उचित उपचार से अधिकांश गंभीर जटिलताओं से बचाव संभव है तथा मां और नवजात दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
संगोष्ठी में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने सुरक्षित मातृत्व के लिए जागरूकता बढ़ाने, गर्भवती महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराने और किसी भी असामान्य लक्षण पर तत्काल चिकित्सकीय सलाह लेने की अपील की। कार्यक्रम का उद्देश्य मातृ एवं नवजात मृत्यु दर में कमी लाने के साथ चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को गर्भावस्था संबंधी गंभीर जटिलताओं के प्रभावी प्रबंधन की नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराना रहा।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

