गाजर घास का समय रहते उन्मूलन जरूरी, लापरवाही से बढ़ता है स्वास्थ्य और खेती पर खतरा : कुलपति
कानपुर, 02 जुलाई (हि.स.)। गाजर घास (पार्थेनियम) का फूल आने से पहले जड़ सहित उखाड़कर ही इसके फैलाव पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है। यह खरपतवार मानव स्वास्थ्य, पशुओं और कृषि फसलों के लिए गंभीर खतरा है। यह बातें गुरुवार को चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. संजीव गुप्ता ने गाजर घास उन्मूलन जागरूकता कार्यक्रम में कहीं।
विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. गुप्ता ने बताया कि गाजर घास देश के विभिन्न क्षेत्रों में सफेद टोपी, चटक चांदनी और गंधी बूटी जैसे नामों से भी जानी जाती है। यह रेलवे लाइन, सड़कों के किनारे तथा खेतों में तेजी से फैलती है और वर्षा ऋतु में अंकुरित होकर कुछ ही समय में गंभीर खरपतवार का रूप ले लेती है।
उन्होंने कहा कि गाजर घास लगभग तीन से चार महीने में अपना जीवन चक्र पूरा कर लेती है। इसके संपर्क में आने से मनुष्यों में त्वचा संबंधी एलर्जी, दमा और बुखार जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जबकि पशुओं के स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
कुलपति ने बताया कि इस खरपतवार के प्रभावी नियंत्रण के लिए फूल आने से पहले इसे जड़ सहित उखाड़ना सबसे कारगर उपाय है। इससे इसके बीज बनने और आगे फैलने की संभावना काफी हद तक समाप्त हो जाती है।
कार्यक्रम के तहत विश्वविद्यालय के सभी छात्रावास परिसरों में गाजर घास उन्मूलन एवं जागरूकता अभियान चलाया गया। इस दौरान सभी वार्डेन, सहायक वार्डेन तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

