भगवान का नाम ही संसार सागर से पार होने का अमोघ अस्त्र : आचार्य योगेन्द्र मिश्र

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भगवान का नाम ही संसार सागर से पार होने का अमोघ अस्त्र : आचार्य योगेन्द्र मिश्र


भगवान का नाम ही संसार सागर से पार होने का अमोघ अस्त्र : आचार्य योगेन्द्र मिश्र


भगवान का नाम ही संसार सागर से पार होने का अमोघ अस्त्र : आचार्य योगेन्द्र मिश्र


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भगवान का नाम ही संसार सागर से पार होने का अमोघ अस्त्र : आचार्य योगेन्द्र मिश्र


भगवान का नाम ही संसार सागर से पार होने का अमोघ अस्त्र : आचार्य योगेन्द्र मिश्र


गोरखपुर, 02 अक्टूबर (हि.स.)। गृहस्थ संत भाईजी श्री हनुमान प्रसाद और उनके नित्य सहचर श्री राधा बाबा की तपोभूमि गीतावाटिका में चल रहे श्रीमद्भागवत पाठ के तीसरे दिन शुक्रवार को 132 विद्वान पुरोहितों ने आचार्य योगेन्द्र मिश्र के मार्गदर्शन में श्रीमद्भागवत के पांचवें स्कंध के नौवें अध्याय से सातवें स्कंध के 15वें अध्याय तक श्लोकात्मक पाठ किया। पूज्य भाईजी के 134वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित यह धार्मिक अनुष्ठान 30 सितंबर से प्रारंभ हुआ है और छह अक्टूबर तक चलेगा।

श्रीमद्भागवत पाठ प्रतिदिन प्रातः आठ बजे से दोपहर 12 बजे तक तथा अपराह्न तीन बजे से शाम छह बजे तक दो सत्रों में हो रहा है। देश के विभिन्न स्थानों के साथ अमेरिका, कनाडा, नेपाल और हैदराबाद आदि से भी श्रद्धालु ऑनलाइन जुड़कर पाठ में सहभागिता कर रहे हैं और अपने पितरों की मुक्ति तथा कल्याण के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।

भगवान का नाम ही सबसे बड़ा सहारा

शुक्रवार को हुए श्रीमद्भागवत पाठ का प्रमुख संदेश रहा कि मानव जीवन में भगवान का नाम ही सबसे बड़ा सहारा है। भक्त के प्रति भगवान की कृपा और संरक्षण का उदाहरण भक्त प्रह्लाद के प्रसंग में मिलता है। श्रीमद्भागवत यह संदेश देता है कि भगवान के प्रति अटूट निष्ठा और विश्वास रखने वाले भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।

पाठ के दौरान मानव जीवन, सृष्टि के रहस्य, भक्ति, वैराग्य और सदाचार से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों का वर्णन हुआ। जड़भरत प्रसंग में देह और आत्मा के भेद तथा संसार के प्रति आसक्ति से मुक्त रहने का संदेश दिया गया। पिछले जन्म की स्मृति के कारण जड़भरत इस जन्म में स्वयं को जड़वत रखते थे। राजा रहूगण की पालकी उठाते समय भी वे जीवों के प्रति दया भाव के कारण धरती को देखकर कदम रखते थे। इससे पालकी हिलने पर राजा के नाराज होने पर जड़भरत ने उन्हें देह और आत्मा के वास्तविक स्वरूप का उपदेश दिया। उनके ज्ञान से प्रभावित होकर राजा रहूगण ने उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। इस प्रसंग में संसार को भवाटवी अर्थात मोह, अज्ञान और दुखों से भरे वन के रूप में समझाया गया।

ब्रह्मांड और नरक लोक का वर्णन

श्रीमद्भागवत के पांचवें स्कंध में शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को ब्रह्मांड की संरचना और उसके रहस्यों का वर्णन किया गया। जम्बूद्वीप सहित सात द्वीपों, सुमेरु पर्वत, सूर्य, चंद्रमा, ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति तथा उनकी गतियों का आध्यात्मिक और दार्शनिक विवेचन किया गया। पाताल लोक तथा अनंत देव शेषनाग के ऐश्वर्य का भी वर्णन मिलता है।

स्कंध के अंतिम अध्यायों में मनुष्य के कर्मों के आधार पर विभिन्न नरक लोकों का वर्णन करते हुए पाप कर्मों से बचने और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई।

हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

Livevns.news Desk
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