आधुनिकता की चकाचौंध में बुन्देलखण्ड से गायब हो रहें परंपरागत होली फागों के बोल

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आधुनिकता की चकाचौंध में बुन्देलखण्ड से गायब हो रहें परंपरागत होली फागों के बोल


बुंदेलखंड में गाई जाती है चौकड़िया, छंद, दहकवा, बृजवासी खड़ी विधा की फागें

हमीरपुर, 02 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में आधुनिकता की चकाचौंध के मध्य होली के फागों के बोल गायब हो गए हैं कभी चौपाले बसंत पंचमी से फागों से गुंजायमान हो उठती थी और रंग पंचमी तक फांगो की गांव-गांव धूम रहती थी। अब ऐसा कहीं नहीं है, युवा वर्ग फागों के बोलों से अनजान है। युवा वर्ग को यह भी मालूम नहीं है कि कितने प्रकार की फागें गाई जाती हैं। इससे बुजुर्ग फाग गायक आहत हैं।

सुमेरपुर ब्लॉक के विदोखर पुरई के मशहूर फाग गायक शिवनाथ सविता ने बताया कि बुंदेलखंड में चौकड़िया, छंद, दहकवा, बृजवासी, खड़ी फाग एवं बड़ी फाग विधा की फागें गाई जाती हैं अब इन फागों को गाने वाले विलुप्त होते जा रहे हैं अभी कुछ गांवों में होली के फाग निकालने की परंपरा विद्यमान है लेकिन आपसी भाईचारे, सद्भाव, प्रेम का अभाव होने से यह परंपरा सिमटती जा रही है। फाग गायक रणविजय सिंह ने बताया कि ज्यादातर गायक कवि ईश्वरी रचित फागे गाते हैं।

इसके अलावा बुंदेलखंड में कवि गंगाधर, कवि जितेंद्र, सुखराम शतक, नन्हे सिंह, दशरथ रचित फागें भी गाई जाती हैं। बयोवृद्ध सीताराम सिंह ने बताया कि यमुना पट्टी गांवों में बड़ी फागों के गायन का चलन है जबकि ब्लाक क्षेत्र के पश्चिमी एवं दक्षिणी दिशा में बसे गांवों में चौकड़िया, छंद, दहकवा, बृजवासी, खड़ी फाग की गायकी का चलन है। मशहूर फाग गायक अमर सिंह ने चौकड़िया, छंद, दहकवा, बृजवासी, खड़ी फागों के बोलो को बताते हुए कहा कि छंद फाग दोहा के अंतरा से शुरू होकर छंद के साथ समाप्त होती है। इसको कुछ इस तरीके से गायक गाते हैं। भंग. दंग झूमत फिरत करत परस्पर जंग, आज ललन होरी करन, नाहक पिलई भंग।

संग शखा लिए बाल, झोरी भरभर गुलाल, मेरा कियो ऐसा हाल सरबोर किया पिया, लाल पियर बैजाना प्याजी पतरंग दिखलाया। चौकड़िया फाग को गायक ऐसे प्रस्तुत करते हैं। भीगी फिरत राधिका रंग में, मनमोहन के संग में। दहकवा के बोल कुछ यूं होते हैं गिरधारी लाल, बनवारी लाल गिरवर. गिरवर गिराधरी। बृजवासी फागुन के साथ चौत्र मास में भी गाने का रिवाज बुंदेलखंड में है। होली में बृजवासी के बोल कुछ इस तरह से हैं। मगरोकट नार पराई छैल, जशोदा के अनोखे नंदलाला। खड़ी फाग कुछ यूं गाया जाता है। दोऊ बाजै पैजाना पावन मा, सुधर नार के आवन मां। लेकिन अब इन फागों के गाने वालो की संख्या नगण्य होती जा रही है। युवा वर्ग का रुझान फागों की तरफ नहीं है बल्कि फिल्मी गानों की ओर है। यही कारण है कि बसंत पंचमी से फागों से गुलजार होने वाली चौपालें अब होली पर्व में भी सुनसान रहती हैं कभी-कभार इनके बोल सुनाई देते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज मिश्रा

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