भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति नहीं : जे.एन. सिन्हा

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भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति नहीं : जे.एन. सिन्हा


गोरखपुर, 16 मार्च (हि.स.)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान को संबोधित करते हुए मुख्यवक्ता इंडियन नेशनल कमीशन फॉर हिस्ट्री ऑफ़ साइंस व इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी के सदस्य तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. जे.एन. सिन्हा ने कहा कि भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आरम्भ 1857 की क्रांति से नहीं बल्कि इससे लगभग 90 वर्ष पूर्व हो गया था। क्रांतिकारी राजा फतेह बहादुर शाही ने अंग्रेजों के खिलाफ विधिवत बगावत का पहला बिगुल फूंका था। क्रांतिकारी बंधू सिंह ने फतेह बहादुर शाही की ही रणनीति को विस्तार दिया।

फतेह शाही ने अंग्रेजों को टैक्स देने से इनकार कर दिया, परिणामतः उन्हें अपने किले व सेना को छोड़कर जंगलों में जीवन बिताना पड़ा।

उन्होंने जंगल में रहकर सशस्त्र प्रतिरोध किया। 20000 सैनिकों की नई फ़ौज खड़ी की, जिसमें लगभग 1000 लोग हुए शहीद हो गए।

फतेह शाही को हिंदू-मुस्लिम व प्रत्येक आम-ओ-खास जनता ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सहयोग किया। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ 30 साल तक अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र लड़ाई लड़ी। अंग्रेज कभी भी न तो फतेह शाही को पकड़ सके और न ही मार सके।

उन्होंने वायसरॉय वारेन हेस्टिंग्स को नाको चने चबवाया, लेकिन अंग्रेजों ने अपनी कमजोरी को प्रकाश में नहीं आने दिया। अंग्रेजी राज

फतेहशाही के अंतहीन हमलों से इतना त्रस्त था कि उनसे जुड़ी सूचनाओं के लीक होने के दर से संवेदनशील फाइलों में बंद कर सीधे इंग्लैंड भेजा करता था। वारेन हेस्टिंग्स में पत्र लिखकर अवध के नवाब से मदद मांगी, लेकिन नवाब ने अंग्रेजों की मदद के नाम पर केवल दिखावा किया. असलियत में नवाब फतेहशाही से सहानुभूति रखते रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

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