प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय से ही सतत कृषि विकास संभव : के. विजयेंद्र पांडियन

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प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय से ही सतत कृषि विकास संभव : के. विजयेंद्र पांडियन


कानपुर, 17 अप्रैल (हि.स.)। सतत कृषि विकास के लिए प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का समन्वय बेहद आवश्यक है। किसानों को नई तकनीकों से जोड़ते हुए नीतिगत समर्थन देना समय की जरूरत है। कृषि क्षेत्र में नवाचारों को बढ़ावा देकर ही भविष्य को सुरक्षित बनाया जा सकता है। यह बातें शुक्रवार को कुलपति एवं मंडल आयुक्त के. विजयेंद्र पांडियन ने कही।

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के स्कूल ऑफ एडवांस्ड एग्रीकल्चर साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी द्वारा वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ऑडिटोरियम में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कृषि सम्मेलन 2026 का शुक्रवार को शुभारंभ हुआ। 17-18 अप्रैल तक चलने वाले इस सम्मेलन का आयोजन इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के सहयोग से किया जा रहा है, जिसमें चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर की भी सहभागिता है।

उद्घाटन सत्र की शुरुआत आयोजन संयोजक एवं निदेशक डॉ. हिमांशु त्रिवेदी के स्वागत उद्बोधन से हुई, जिसमें उन्होंने सम्मेलन की थीम भारतीय प्राचीन ज्ञान प्रणाली और आधुनिक कृषि नवाचारों के समन्वय पर प्रकाश डाला। आयोजन सचिव डॉ. श्रेया सिंह ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए तकनीकी सत्रों और शोध प्रस्तुतियों की जानकारी दी। इस दौरान कॉन्फ्रेंस स्मारिका और बुक ऑफ एब्स्ट्रैक्ट्स का विमोचन भी किया गया।

सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने सतत कृषि, नवाचार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर अपने विचार रखे। जर्मनी से आए डॉ. उलरिच बर्क ने होमा फार्मिंग और अग्निहोत्र के माध्यम से सतत विकास की अवधारणा प्रस्तुत की। आईसीएआर-एटारी कानपुर के डॉ. राघवेंद्र सिंह ने कृषि विस्तार में नवाचारों की भूमिका पर जोर दिया, जबकि आईसीएआर-आईआईपीआर के डॉ. जी.पी. दीक्षित ने दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने की आवश्यकता बताई।

प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी ने शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के समन्वय को कृषि विकास का आधार बताया। वहीं कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में इस तरह के सम्मेलनों को भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच बताया।

तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने कृषि से जुड़े विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए। डॉ. आर.के. पाठक ने कॉस्मिक फार्मिंग इनोवेशन पर विचार रखे, जबकि डॉ. एस.के. चतुर्वेदी ने फसल सुधार और उत्पादन वृद्धि की रणनीतियों पर चर्चा की। डॉ. शिव दत्त ने बौद्धिक संपदा अधिकारों की भूमिका पर प्रकाश डाला और डॉ. दीपा द्विवेदी ने नैनोटेक्नोलॉजी को किसानों के लिए उपयोगी बताया।

दो दिवसीय यह सम्मेलन तकनीकी सत्रों, शोध पत्र प्रस्तुतियों और विचार-विमर्श के माध्यम से कृषि क्षेत्र में नवाचारों को बढ़ावा देगा। कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और सहयोगी संस्थानों के प्रति आभार व्यक्त किया।

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

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