कॉंग्रेस और सपा के साथ आरएलडी ने हमेशा गंवाई सीट

बागपत, 3 अप्रैल (हि.स.)। स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह ने 1980 में अपने पिता की उंगली पकड़कर राजनीति में कदम रखा था। अपने पिता स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद अजीत सिंह ने 1987 में लोकदल अध्यक्ष पद संभाला। 1988 में जनता पार्टी के अध्यक्ष घोषित कर दिए गए। पिता की विरासत सीटों को बचाए रखना अजीत सिंह के लिए चुनौतियाँ था। ऐसे में अपनी जमीन तलाश रहे अजीत सिंह ने कांग्रेस का दामन थामा। कॉंग्रेस में अजीत सिंह मंत्री तो बन गए लेकिन अजीत सिंह का जनाधार पूरी तरह बिखर गया। 1996 के लोकसभा चुनाव के बाद वह कांग्रेस से अलग हो गए। जिसके बाद वह संयुक्त मोर्चा का हिस्सा बने। इस मोर्चे में मुलायम सिंह यादव, देवगोड़ा, गुजराल सरकार में भी अजीत सिंह मंत्री रहे।

खिसका जनाधार तो भाजपा आयी याद

कांग्रेस और सपा के साथ इधर-उधर पाला बदलना अजीत सिंह को भारी पड़ा। 1998 में उनकाे लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। साल 1999 के लोकसभा चुनाव में अजीत सिंह चुनाव जीते और बाद में बीजेपी से समझौता कर लिया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में उनको कृषि मंत्री बनाया गया। साल 2002 में विधानसभा चुनाव आरएलडी ने बीजेपी के साथ मिलकर लड़ा जिसमें आरएलडी को 14 सीट मिली, लेकिन चुनाव के बाद अजीत सिंह ने अटल सरकार से इस्तीफा दे दिया और बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया। यही वह समय था जिसके बाद आरएलडी का वजूद समाप्त होने की ओर बढ़ता ही चला गया।

सपा को फायदा आरएलडी को नुकसान

2004 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर किस्मत आजमाई जो सपा के लिए वरदान साबित रही। लेकिन आरएलडी को तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा। जबकि सपा को 35 सीट मिली। चार साल बाद दोनों का गठबंधन टूट गया। 2007 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी ने अपने दम पर 10 सीट जीतकर अपने वजूद का अहसास कराया।

मंत्री पद के लिए बदलते रहे पाला

अजीत सिंह की राजनीति में मंत्री पद लेकर अपना वजूद बनाये रखा । जिसके लिए वह बार बार अलग अलग पार्टी के साथ गठबंधन करते रहे। लेकिन इतिहास ही बात करें तो कॉंग्रेस या सपा के साथ आरएलडी को भले ही मंत्री पद मिला हो लेकिन सीटों का हमेशा नुकसान रहा और जनाधार बिखरता गया। जबकि भाजपा के साथ आरलडी को हमेशा फायदा रहा।

पांच दशक से भाजपा से नाता

उत्तर प्रदेश में आरएलडी ने बीजेपी के साथ चौथी बार गठबंधन किया है दोनों दलों के बीच पांच दशक से गठबंधन का नाता रहा है। 1977 में जनसंघ के नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जनता पार्टी का हिस्सा बने थे। चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजीत सिंह ने वर्ष 2002 में विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ चुनाव लड़ा जिसमें आरएलडी को विधानसभा में 14 सीट मिली थी। जबकि 2009 के लोकसभा चुनाव में 5 सीट पर विजय हासिल कर आरएलडी फायदे में रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी ने एनडीए का साथ लेकर चुनावी दाव खेला है जिनका फायदा दोनों ही दलों को मिलता दिखाई दे रहा है जबकि विपक्षियों में कोहराम मच हुआ है।

हिन्दुस्थान समाचार/ सचिन/बृजनंदन

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