खत्म हो जाएंगी भारतीय गायों की नस्लें? ‘सेक्स सॉर्टेड सीमेन’ तकनीक पर भारतीय किसान संघ ने उठाया सवाल

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खत्म हो जाएंगी भारतीय गायों की नस्लें? ‘सेक्स सॉर्टेड सीमेन’ तकनीक पर भारतीय किसान संघ ने उठाया सवाल


- सीमेन तकनीक से गायों की नस्ल, जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालीन संकट

- तकनीक से घटेगी आनुवांशिक विविधता, पारंपरिक गौपालन व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की जरूरत

- गौवंश संरक्षण पर भारतीय किसान संघ की चेतावनी, ‘सेक्स सॉर्टेड सीमेन’ तकनीक पर तत्काल प्रतिबंध की मांग

लखनऊ, 05 मार्च (हि.स.)। भारत की कृषि संस्कृति में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवन, आजीविका और प्रकृति के संतुलन का आधार रही है। खेतों की हरियाली से लेकर मिट्टी की उर्वरता तक ग्रामीण जीवन का ताना-बाना सदियों से गौवंश के साथ जुड़ा रहा है। अब आधुनिक पशु प्रजनन तकनीक के नाम पर एक ऐसा प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है, जिस पर देश के किसानों के बीच गंभीर चिंता उभरने लगी है।

इसी चिंता को राष्ट्रीय मंच पर उठाते हुए भारतीय किसान संघ ने आधुनिक लिंगानुसार वर्गीकृत वीर्य (सेक्स सॉर्टेड सीमेन) तकनीक के उपयोग पर सवाल खड़े किए हैं। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि इस तकनीक का अनियंत्रित उपयोग जारी रहा तो आने वाले वर्षों में भारतीय गौवंश की आनुवांशिक विविधता और कई पारंपरिक नस्लों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा सकता है। यह मुद्दा तब राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना जब भारतीय किसान संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया गया। यह बैठक 27, 28 फरवरी और 1 मार्च 2026 को भाग्यनगर (हैदराबाद) में आयोजित हुई, जिसमें देशभर से आए प्रतिनिधियों ने गौवंश संरक्षण और पशु प्रजनन नीति पर गहन चर्चा की।

जब गांव की जिम्मेदारी था गौवंश

किसान संघ काशी प्रान्त के प्रान्त संगठन मंत्री रामचेला ने बताया कि भारत में गोपालन केवल आर्थिक गतिविधि नहीं था, बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी का हिस्सा था। गांवों में चयनित और स्वस्थ सांडों को पूरे गांव की गायों के प्रजनन के लिए रखा जाता था। कुछ वर्षों बाद इन सांडों की पड़ोसी गांवों के साथ अदला-बदली की जाती थी, ताकि आनुवांशिक विविधता बनी रहे और सगोत्रीय प्रजनन से बचा जा सके। यह पारंपरिक व्यवस्था आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुरूप मानी जाती है, जो नस्लों की दीर्घकालीन मजबूती और अनुकूलन क्षमता को बनाए रखती थी।

सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक पैदा कर सकती है असंतुलन

आधुनिक पशुपालन व्यवस्था में तेजी से बढ़ती सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक अब नई बहस का कारण बन रही है। इस तकनीक के माध्यम से नर बछड़ों के जन्म को कम कर मादा बछड़ों की संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जाता है, ताकि दूध उत्पादन बढ़ाया जा सके। भारतीय किसान संघ का कहना है कि यह तात्कालिक रूप से दूध उत्पादन के दृष्टिकोण से उपयोगी दिखाई दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में इससे भारतीय गौवंश की आनुवांशिक विविधता कम होने का खतरा है। यदि लगातार सीमित आनुवांशिक स्रोतों का उपयोग किया गया तो आने वाले 25 से 30 वर्षों में कई स्थानीय नस्लों के लुप्त होने की आशंका भी बढ़ सकती है। इसके परिणामस्वरूप पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता, प्रजनन क्षमता और उत्पादन क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

गाय कृषि की जीवनरेखा

किसान संघ के रामचेला ने बताया कि गाय को केवल दूध उत्पादन तक सीमित करना भारतीय कृषि परंपरा के साथ न्याय नहीं होगा। गोबर और गोमूत्र जैविक खेती की आधारशिला हैं, जो मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने और भूमि की उर्वरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से जूझ रही है, तब भारतीय गौवंश आधारित जैविक कृषि प्रणाली को एक स्थायी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

समाधान प्रबंधन में, तकनीक में नहीं

प्रान्त संगठन मंत्री रामचेला ने बताया कि निराश्रित बछड़ों की समस्या को तकनीक के माध्यम से खत्म करने की बजाय बेहतर प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी से हल किया जा सकता है। संघ का मानना है कि यदि एक बार किसी नस्ल की आनुवांशिक विविधता खत्म हो गई तो उसे फिर से वापस लाना लगभग असंभव होगा। इसलिए गौवंश संरक्षण केवल पशुपालन का मुद्दा नहीं, बल्कि देश की जैविक संपदा और कृषि भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

केंद्र सरकार से कीं छह प्रमुख मांगें

भारतीय किसान संघ ने केंद्र सरकार से गौवंश प्रजनन नीति की समीक्षा करते हुए कई ठोस कदम उठाने की मांग की है। उनकी मांग है कि भारतीय गायों में लिंगानुसार वर्गीकृत वीर्य तकनीक के उपयोग पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाए। गांवों में पारंपरिक गौवंश प्रजनन व्यवस्था को पुनर्जीवित किया जाए। किसानों को इस तकनीक के संभावित दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया जाए। गौ आधारित जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रति गाय और बैल पर प्रोत्साहन राशि दी जाए। भारतीय स्थानीय नस्लों के संरक्षण और जलवायु अनुकूल प्रजनन के लिए शोध को मजबूत किया जाए। गौपालन को समुदाय आधारित रोजगारोन्मुखी व्यवस्था के रूप में विकसित कर वित्तीय सहायता सीधे किसानों को दी जाए।

परंपरा और विज्ञान के संतुलन की चुनौती

रामचेला ने कहा कि तकनीकी प्रगति का विरोध नहीं किया जा रहा, बल्कि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि विकास की दिशा ऐसी हो जो प्रकृति, जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ संतुलन बनाए रखे। उन्होंने कहा कि भारत के पास दुनिया की सबसे समृद्ध गौवंश विविधता है। यदि इसे संरक्षित और सुदृढ़ किया गया तो यह न केवल कृषि बल्कि पर्यावरण और ग्रामीण आत्मनिर्भरता के लिए भी एक बड़ी ताकत साबित हो सकती है। दरअसल, सवाल केवल एक तकनीक का नहीं, बल्कि उस परंपरा का है जिसने सदियों से भारतीय खेतों, गांवों और जीवन को पोषित किया है।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश

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