एनीमिया की रोकथाम के लिए समय पर जांच और उपचार जरूरी: अमित कुमार घोष
लखनऊ, 23 अप्रैल (हि.स.)। अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अमित कुमार घोष ने कहा कि एनीमिया बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है और उनकी सोचने-समझने की क्षमता को कम कर देता है, जिससे दीर्घकाल में आर्थिक हानि भी होती है। अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य ने यह विचार गुरूवार को लखनऊ के एक होटल में एनीमिया विषय पर आय़ोजित राज्य स्तरीय मीडिया संवेदीकरण कार्यशाला में व्यक्त किए। कार्यशाला का उद्देश्य एनीमिया के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा इसके प्रभावी नियंत्रण एवं उपचार के लिए मीडिया की भूमिका को सुदृढ़ करना था।
उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने एनीमिया मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत एनीमिया नियंत्रण को उच्च प्राथमिकता दी है। इस अभियान की 6x6x6 रणनीति जीवन के प्रत्येक चरण में एनीमिया की रोकथाम और उपचार पर केंद्रित है, जिसमें शिशु, किशोर और गर्भवती महिलाएं प्रमुख रूप से शामिल हैं।
श्री घोष ने बताया कि राज्य में आशा एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से अग्रिम पंक्ति पर आयरन और फोलिक एसिड की खुराक, कृमिनाशक दवाएं, पोषण संबंधी परामर्श तथा नियमित जांच की व्यवस्था को सुदृढ़ किया गया है। प्रदेश में 83.4 प्रतिशत प्रसव चिकित्सा संस्थानों में हो रहे हैं, जिससे माताओं और नवजात शिशुओं को रोके जा सकने वाले जोखिमों से सुरक्षा मिल रही है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार शीघ्र ही मातृ एनीमिया के उन्नत निदान और उपचार की सुविधाएं प्रारंभ करने जा रही है। नियमित जांच के लिए डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर का उपयोग किया जा रहा है तथा वर्ष 2026 में अंतःशिरा आयरन-फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़ (Intravenous iron-Ferric Carboxymaltose) की 3.7 लाख खुराकें प्राप्त की गई हैं। उन्होंने बताया कि आईवी-एफसीएम मध्यम एवं गंभीर एनीमिया के लिए एक प्रभावी एकल खुराक उपचार है, जिसे गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित रूप से दिया जा सकता है और यह चिकित्सकीय रूप से प्रभावी सिद्ध हो चुका है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि केवल कार्यक्रमों की पहुंच बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि एनीमिया के प्रति जनजागरूकता अत्यंत आवश्यक है। समय पर पहचान और रोकथाम से गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं, मातृ मृत्यु दर तथा बच्चों के संज्ञानात्मक विकास में कमी जैसे जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उन्होंने मीडिया की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि मीडिया गर्भवती महिलाओं में एनीमिया और उसके उपचार विकल्पों, जैसे आईवी-एफसीएम, के बारे में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है, जिससे समय पर उपचार सुनिश्चित हो सके। साथ ही उन्होंने आग्रह किया कि मीडिया मिथकों को तोड़ने और जनविश्वास बढ़ाने के लिए वास्तविक सफलता की कहानियों को प्रमुखता से प्रस्तुत करे, ताकि अधिक से अधिक लोग समय पर जांच और उपचार के लिए आगे आएं।
उन्होंने कहा कि एनीमिया की रोकथाम और उपचार संभव है, और अब आवश्यकता है कि इस विषय पर जनसामान्य में मांग उत्पन्न हो तथा मीडिया इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाकर इसे जन-जन तक पहुंचाए।
कार्यशाला में जिम्स के निदेशक ब्रिगेडियर डॉ. राकेश गुप्ता, महानिदेशक चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण हरिदास अग्रवाल, महानिदेशक प्रशिक्षण रंजना खरे सहित अन्य विभागीय वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित थे।
हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन

