वृद्धजनों की चिकित्सा में विशेष संवेदनशीलता की आवश्यकता : प्रो. शेट्टी
कार्यक्षमता पर पड़ता है वृद्धावस्था में मांसपेशियों के घटते द्रव्यमान का असर : डॉ. राजकिशोर
गोरखपुर, 05 नवंबर (हि.स.)। महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय गोरखपुर (एमजीयूजी) के गुरु गोरक्षनाथ इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आयुर्वेद कॉलेज) के भारतीय ज्ञान परंपरा आईकेएस पारंपरिक चिकित्सा केंद्र की तरफ से आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘दीर्घायु 2026’ के दूसरे दिन के विभिन्न सत्रों में डिमेंशिया प्रबंधन, तंत्रिका विकारों की आयुर्वेदिक चिकित्सा, वृद्धजनों में शल्य चिकित्सा जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने गहन मंथन किया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन के प्रथम तकनीकी सत्र में श्री बीएम कांकेनवाड़ी आयुर्वेद महाविद्यालय, बेलगावी के प्राचार्य एवं चिकित्सा निदेशक प्रो. डॉ.सुहास कुमार शेट्टी ने डिमेंशिया के प्रबंधन में समयबद्ध पहचान और पारिवारिक सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि वृद्धजनों की चिकित्सा में विशेष संवेदनशीलता, धैर्य एवं व्यक्तिगत देखभाल की आवश्यकता होती है। सत्र की अध्यक्षता डॉ. दिनेश कुमार सिंह ने की। डॉ. संदीप कुमार उपाध्याय ने सह-अध्यक्ष तथा डॉ. रचना एएस ने सत्र संचालन का दायित्व निभाया।
गुरुवार को दूसरे तकनीकी सत्र में डॉ. बीआरकेआर राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय हैदराबाद के सेवानिवृत्त आचार्य डॉ. एम. श्रीनिवासुलु ने वात संतुलन एवं व्यक्ति की प्रकृति के अनुरूप आयुर्वेदिक चिकित्सा पर बल देते हुए कहा कि वृद्धावस्था में वात दोष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। साथ ही तंत्रिका संबंधी विकारों के उपचार में वात संतुलन, रोगी की प्रकृति, शारीरिक क्षमता एवं रोगावस्था का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने पारंपरिक आयुर्वेदिक सिद्धांतों और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के समन्वय को प्रभावी एवं समग्र स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए आवश्यक बताया। सत्र की अध्यक्षता डॉ. चंद्र प्रताप सिंह ने की तथा डॉ. जितेंद्र कुमार मिश्रा ने सह-अध्यक्ष की भूमिका निभाई। डॉ. दीक्षा एवं डॉ. प्रीति ने सत्र का संचालन किया।
एक अन्य सत्र में उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा एवं अनुसंधान से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान एवं नवाचार के लिए भी महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान, दर्शन, संस्कृति एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि अपनी ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन एवं अकादमिक पुनर्स्थापना से ही भारतीय बौद्धिक विरासत को व्यापक पहचान मिल सकती है। सत्र की अध्यक्षता संस्थान के प्राचार्य डॉ. गिरिधर वेदांतम ने की तथा आचार्य साध्वी नंदन पांडेय ने सह-अध्यक्ष के रूप में सहभागिता की। बी.डी. भारती ने सत्र का संचालन किया तथा भावना कुमावत ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
एक अन्य तकनीकी सत्र में बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर में मेडिसिन विभाग के आचार्य डॉ. राजकिशोर सिंह ने सार्कोपीनिया एवं मांसपेशियों के स्वास्थ्य पर विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि वृद्धावस्था में मांसपेशियों के घटते द्रव्यमान का असर कार्यक्षमता पर पड़ता है। उन्होंने मायोकाइन्स, आंत्र-मांसपेशी अक्ष एवं सार्कोपेनिक मोटापे की अवधारणा समझाते हुए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम तथा मांसपेशियों के संरक्षण के महत्व पर बल दिया। सत्र की अध्यक्षता डॉ. वर्षा मोखासी ने की तथा सह-अध्यक्ष के रूप में डॉ. संजय भट्ट उपस्थित रहे। सत्र का संचालन डॉ. वैसाख ने किया तथा रिपोर्टिंग सुश्री मेघा ने की।
हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

